वैश्विक तापवृद्धि की सीमा पार होने पर क्या हो दुनिया की रणनीति?

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया टिप्पणियों ने चेतावनी दी है कि अगले कुछ वर्षों में वैश्विक तापमान वृद्धि 1.5°C की सीमा को पार कर सकती है, जिससे निर्धारित तापमान सीमा से अस्थायी रूप से आगे निकलने की स्थिति (Climate Overshoot) लगभग अपरिहार्य हो सकती है। UNEP द्वारा सुझाया गया “सीमा-अतिक्रमण, चरम तापमान और पुनः क्रमिक गिरावट” (ओवरशूट, पीक और डिक्लाइन) का मार्ग यह रेखांकित करता है कि उभरते जलवायु जोखिमों की गंभीरता और अवधि को सीमित करने के लिए त्वरित, व्यापक और निरंतर सुधारात्मक कार्रवाई आवश्यक होगी।

निर्णायक जलवायु सीमाएँ और अपरिवर्तनीय जोखिम

  • हिमचादरों का ढहना, अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) में व्यवधान और अमेज़न वनों का क्षय जैसे महत्वपूर्ण सीमा-बिंदुओं के पार जाने से ऐसे जोखिम पैदा हो सकते हैं, जिन्हें मानवीय समय-सीमा में पलटना संभव नहीं होगा। इससे यह धारणा कमजोर पड़ती है कि ओवरशूट केवल एक अस्थायी और सुधार योग्य चरण है।
  • इसलिए अग्रिम और तीव्र शमन आवश्यक है। केवल तीव्र और निरंतर उत्सर्जन कटौती तथा नेट-ज़ीरो की दिशा में प्रगति ही तापमान के शिखर को सीमित कर सकती है और ओवरशूट की अवधि को छोटा कर सकती है।

संचयी और गैर-रेखीय प्रभाव

  • खाद्य सुरक्षा, जल प्रणालियों और तटीय बस्तियों पर पड़ने वाले जोखिम तापमान वृद्धि के साथ समान अनुपात में नहीं बढ़ते। ओवरशूट का प्रत्येक चरण पिछले चरणों के प्रभावों को अपने साथ लेकर चलता है, जिससे क्रमिक नीति-प्रतिक्रिया और कठिन हो जाती है।
  • इसलिए शमन और अनुकूलन की समेकित योजना आवश्यक है। निष्क्रिय शीतलन जैसी ऐसी पहलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिनसे दोनों प्रकार के लाभ मिलें और अनुकूलन केवल प्रतिक्रियात्मक न रहकर रूपांतरणकारी बने।

जलवायु न्याय की कमी

  • ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन करने वाले देशों पर तात्कालिक प्रभाव अपेक्षाकृत कम पड़ता है, जबकि विशेषकर लघु द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS) को असमान और अस्तित्वगत जोखिमों का सामना करना पड़ता है।
  • इसका समाधान विभेदित और समावेशी उत्तरदायित्व में निहित है, जिसमें उच्च उत्सर्जक देश अधिक तीव्र और प्रभावी कार्रवाई करें तथा अत्यधिक प्रभावित देशों को हानि एवं क्षति संबंधी वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी मिले।

तकनीकी समाधानों की सीमाएँ

  • आशावादी अनुमानों के बावजूद कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन (CDR) तापमान को केवल कुछ दशमलव डिग्री तक ही घटा सकता है और इसके साथ शासन तथा समानता संबंधी जोखिम भी जुड़े हैं।
  • इसलिए CDR का उपयोग कठोर नियमन के अंतर्गत केवल उत्सर्जन कटौती के पूरक के रूप में होना चाहिए, उसके विकल्प के रूप में नहीं।

निष्कर्ष

जब ओवरशूट को स्वाभाविक रूप से प्रतिवर्ती नहीं माना जा सकता, तब प्रत्येक संरचनात्मक जोखिम के अनुरूप संतुलित, न्यायसंगत और समयबद्ध प्रतिक्रिया ही जलवायु स्थिरता की दिशा में विश्वसनीय मार्ग प्रदान कर सकती है।