ऊर्जा सुरक्षा: भारत की उभरती चुनौतियाँ और नीतिगत प्राथमिकताएँ

स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) की दिशा में भारत का संक्रमण तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। एक ओर नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का विस्तार हो रहा है और जीवाश्म ईंधनों पर आयात-निर्भरता में कमी के संकेत मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी नई और अपेक्षाकृत कम दिखाई देने वाली चुनौतियाँ उभर रही हैं। आज भारत की ऊर्जा सुरक्षा केवल ईंधन की उपलब्धता तक सीमित नहीं रही, बल्कि क्रिटिकल मिनरल्स पर निर्भरता, विद्युत अवसंरचना की सीमाएँ तथा घरेलू विनिर्माण की कमजोरियाँ भी इसके प्रमुख निर्धारक बन गई हैं।

क्रिटिकल मिनरल्स: ऊर्जा संक्रमण की सबसे बड़ी चुनौती

  • लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, सिलिकॉन, दुर्लभ मृदा तत्व, गैलियम, जर्मेनियम तथा प्लैटिनम समूह तत्वों जैसे महत्त्वपूर्ण खनिजों के लिए भारत लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर है। ये बैटरियों, सौर पैनलों तथा इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माण के लिए अत्यावश्यक हैं।
  • वर्ष 2070 तक भारत को ताँबा, ग्रेफाइट, सिलिकॉन तथा निकेल की आवश्यकता करोड़ों टन तक पहुँचने का अनुमान है।
  • इससे भारत उसी प्रकार की आपूर्ति श्रृंखला एवं भू-राजनीतिक जोखिमों का सामना कर सकता है, जैसा कभी कच्चे तेल पर निर्भरता के कारण होता था। अंतर केवल इतना है कि अब यह निर्भरता कुछ सीमित खनिज-निर्यातक देशों पर केंद्रित है।

अवसंरचना एवं निवेश संबंधी चुनौतियाँ

  • भारत में प्रति व्यक्ति विद्युत खपत अभी भी वैश्विक औसत से कम है, जिससे आर्थिक विकास के साथ ऊर्जा माँग में तीव्र वृद्धि की संभावना है।
  • इस बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए ऊर्जा भंडारण, विद्युत पारेषण नेटवर्क तथा ग्रिड विश्वसनीयता में बड़े पैमाने पर निवेश के साथ-साथ परमाणु ऊर्जा की भूमिका को भी सुदृढ़ करना होगा।
  • इन क्षेत्रों में समानांतर प्रगति के बिना केवल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ाना दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता।

घरेलू विनिर्माण: सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी

  • स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों के घरेलू विनिर्माण, जैसे सौर सेल, बैटरियाँ तथा क्रिटिकल मिनरल्स के प्रसंस्करण की क्षमता विकसित करना आयात-निर्भरता कम करने तथा बाह्य झटकों से सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।

निष्कर्ष

भारत का ऊर्जा संक्रमण अनेक अवसरों के साथ नई चुनौतियाँ भी लेकर आया है। आज वास्तविक ऊर्जा सुरक्षा केवल ईंधन की उपलब्धता से नहीं, बल्कि क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति, सुदृढ़ ऊर्जा अवसंरचना तथा प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने से ही संभव होगी।