UNGA के 81वें सत्र में भारत: विश्व-व्यवस्था को लेकर क्या है भारतीय दृष्टिकोण?
संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र (UNGA 81) में भारत का संदेश वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के एक केंद्रीय विरोधाभास पर आधारित रहा: दुनिया अधिक बहुध्रुवीय हो रही है, लेकिन वैश्विक संस्थाएँ और नियम अब भी शक्ति के पुराने वितरण से प्रभावित हैं। भारत का रुख न तो मौजूदा व्यवस्था को खारिज करने का है और न ही किसी प्रतिस्पर्धी गुट के साथ खड़े होने का; बल्कि वह बहुपक्षवाद को भीतर से अधिक प्रभावी और प्रतिनिधिक बनाने का प्रयास कर रहा है।
रणनीतिक स्वायत्तता के साथ बहुध्रुवीयता
- भारत की बहुध्रुवीयता की प्राथमिकता मूलतः संप्रभु निर्णय की स्वतंत्रता बनाए रखने से जुड़ी है।
- जैसे-जैसे वित्त, प्रौद्योगिकी, बाजार और आपूर्ति शृंखलाएँ भू-राजनीतिक दबाव के साधन बनती जा रही हैं, रणनीतिक स्वायत्तता अब केवल रक्षा नीति तक सीमित नहीं है; इसका विस्तार ऊर्जा, व्यापार, प्रौद्योगिकी और संपर्क तक हो गया है।
- इसलिए भारत ऐसी विश्व-व्यवस्था चाहता है, जिसमें शक्ति के अनेक केंद्र सह-अस्तित्व में रहें और देशों को कठोर भू-राजनीतिक खेमों में शामिल होने के लिए बाध्य न किया जाए।
शक्ति के पुनर्वितरण के अनुरूप प्रतिनिधित्व
- संस्थागत सुधार की भारत की माँग एक गहरी चिंता को भी दर्शाती है: यदि प्रतिनिधित्व में लंबे समय तक असंतुलन बना रहे, तो बहुपक्षीय संस्थाओं की वैधता कायम नहीं रह सकती।
- मुद्दा केवल भारत की बड़ी भूमिका की आकांक्षा का नहीं है, बल्कि यह भी है कि 1945 में निर्मित संस्थाएँ 21वीं सदी की चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सकती हैं या नहीं, जबकि प्रमुख विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व अब भी उनकी वास्तविक वैश्विक भूमिका के अनुरूप नहीं है।
नियमों के अनुयायी से नियम-निर्माता तक
- समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद और उभरती प्रौद्योगिकियों में संप्रभु निर्णय-क्षेत्र पर भारत का जोर एक अन्य बदलाव को दर्शाता है; मौजूदा नियमों के भीतर केवल अपने लिए स्थान तलाशने से आगे बढ़कर उनके निर्माण में भागीदारी की ओर।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और समुद्री परिवहन की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भारत की सक्रियता भी इसी व्यापक महत्वाकांक्षा को मजबूत करती है।
निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत का संदेश इस प्रकार एक व्यापक रणनीतिक उद्देश्य को प्रतिबिंबित करता है:
एक ऐसी सुधारित, बहुलतावादी और कम दबावकारी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, जिसमें विभिन्न शक्ति केंद्रों के लिए स्थान हो। हालांकि, भारत की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने इन
सैद्धांतिक दावों को गठबंधनों, संस्थागत पहलों और व्यवहार्य वैश्विक नियमों में किस हद तक बदल पाता है।