श्रम बाजार का बदलता स्वरूप: भारत की प्रगति और मौजूदा संरचनात्मक चुनौतियां
भारत का श्रम बाजार एक क्रमिक संरचनात्मक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जिसमें औपचारिकीकरण में वृद्धि, महिला रोजगार संकेतकों में सुधार तथा वेतनभोगी (सैलरी आधारित) रोजगार का विस्तार देखा जा रहा है। तथापि, कुछ दीर्घकालिक चुनौतियाँ देश की जनसांख्यिकीय क्षमता को सीमित करती रही हैं।
उभरते सकारात्मक रुझान
- नियमित वेतनभोगी रोजगार में वृद्धि रोजगार की गुणवत्ता में सुधार तथा सामाजिक सुरक्षा तक बेहतर पहुँच को दर्शाती है।
- साथ ही, शहरी महिला श्रम भागीदारी में वृद्धि समावेशी विकास की दिशा में परिवर्तन का संकेत देती है।
- महिला स्वरोजगार आय में वृद्धि लैंगिक वेतन असमानता में क्रमिक कमी तथा महिलाओं की आर्थिक स्वायत्तता में विस्तार को भी दर्शाती है।
निरंतर बनी हुई संरचनात्मक बाधाएं
- इन सुधारों के बावजूद भारत में कौशल का गंभीर अभाव बना हुआ है, जहाँ कार्यबल का केवल एक छोटा हिस्सा ही औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करता है।
- ‘नॉट इन एम्प्लॉयमेंट, एजुकेशन ऑर ट्रेनिंग’ (NEET) श्रेणी में युवाओं का बड़ा अनुपात शिक्षा और रोजगार के बीच कमजोर संबंध तथा अपर्याप्त ‘रोजगार-तैयारी’ (जॉब रेडीनेस) को दर्शाता है।
- इसके अतिरिक्त, श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) में गिरावट से यह स्पष्ट होता है कि कार्यबल में स्थायी जुड़ाव के लिए बाधाएँ बनी हुई हैं, विशेषकर उन महिलाओं के लिए जो अवैतनिक घरेलू श्रम में संलग्न हैं।
निष्कर्ष
भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश तभी उत्पादक विकास में परिवर्तित हो सकता है जब उद्योग-अनुकूल कौशल विकास, महिला श्रम शक्ति की उच्च प्रतिधारण दर तथा श्रम-गहन क्षेत्रों में रोजगार सृजन को सशक्त किया जाए। मानव पूंजी निर्माण में संरचनात्मक सुधार सतत श्रम बाजार परिवर्तन के लिए अनिवार्य हैं।