सीमित मूल्य-सीमा, असीमित मार्जिन: भारत की औषधि मूल्य-नियंत्रण व्यवस्था पर पुनर्विचार

भारत की औषधि मूल्य-निर्धारण व्यवस्था अंतिम मूल्य-सीमा को तो नियंत्रित करती है, लेकिन आपूर्ति शृंखला के विभिन्न स्तरों पर होने वाले मार्जिन को नियंत्रित नहीं करती। इसके कारण खुदरा विक्रेता को मूल्य (PTR) और अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच 1,000% तक का मूल्य-वर्धन संभव हो जाता है। इस मूल्य-अंतर को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की हालिया चिंता ने इस संरचनात्मक ख़ामी को नज़रअंदाज़ करना असंभव बना दिया है, विशेषकर कैंसर रोगियों के लिए।

प्रमुख नियामकीय कमियाँ

  • औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 अनुसूचित औषधियों की अधिकतम मूल्य-सीमा निर्धारित करता है, लेकिन अस्पताल-स्तर के लेन-देन को विनियमित नहीं करता।
  • कम कीमत पर औषधि खरीदने वाला अस्पताल भी उसे निर्धारित अधिकतम मूल्य-सीमा पर काफी अधिक कीमत में बेच सकता है और इस अंतर की राशि अपने पास रख सकता है।
  • कई कैंसर-रोधी औषधियों सहित गैर-अनुसूचित औषधियाँ अधिकतम मूल्य-नियंत्रण के दायरे से बाहर बनी हुई हैं।

संरचनात्मक चुनौतियाँ

  • चूँकि ये औषधियाँ खुले बाजार में सीधे रोगियों द्वारा नहीं खरीदी जातीं, इसलिए अस्पताल ही ब्रांड का निर्णय करते हैं। परिणामस्वरूप, निर्माता रोगियों के बजाय संस्थानों को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
  • कम PTR के साथ बढ़े हुए MRP एक प्रकार के अप्रत्यक्ष कमीशन के रूप में कार्य करते हैं।
  • अस्पताल परिसर में स्थित अनिवार्य फार्मेसियाँ रोगियों को अन्य स्थानों से दवा खरीदने का विकल्प नहीं देतीं, जिससे सस्ते समकक्ष विकल्पों को नुकसान पहुँचता है और परिवारों पर वित्तीय दबाव बढ़ता है। इससे लंबे उपचार वाले मामलों में उपचार का पालन न करने (Non-adherence) की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।

नियामकीय अनिवार्यताएँ

  • राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा 2019 में किए गए एक अभ्यास में 42 कैंसर-रोधी औषधियों के व्यापार मार्जिन को 30% तक सीमित किया गया। इसके परिणामस्वरूप 526 ब्रांडों की कीमतों में 91% तक की कमी आई, जिससे यह सिद्ध होता है कि मार्जिन को कम किया जा सकता है।
  • इसलिए, सरकार को सभी औषधि श्रेणियों में व्यापार मार्जिन की अधिकतम सीमा निर्धारित करनी चाहिए तथा प्रतिगामी मार्जिन संरचना (Regressive Margin Structure) अपनानी चाहिए, जिसमें महँगी औषधियों के लिए मार्जिन का प्रतिशत कम हो, ताकि महँगे ब्रांडों को प्राथमिकता देने वाले प्रोत्साहनों को कम किया जा सके।
  • नियामकों को अस्पताल के भीतर ही औषधि खरीदने की अनिवार्यता पर भी अंकुश लगाना चाहिए तथा MRP में पारदर्शिता अनिवार्य करनी चाहिए।

निष्कर्ष

केवल दवाओं की अधिकतम कीमत तय कर देने से समस्या खत्म नहीं होती, जब तक उनके व्यापारिक मार्जिन पर भी नियंत्रण न हो। ऐसी स्थिति में कीमतों का बोझ अंततः मरीजों पर ही पड़ता रहता है। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में वहनीयता को केवल कागजी नहीं, बल्कि वास्तविक बनाने के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर समन्वित प्रवर्तन के माध्यम से बाजार-प्रोत्साहनों को रोगी कल्याण के अनुरूप करना आवश्यक है।