दिल्ली में हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान ‘पेलेट गन’ तथा अन्य भीड़-नियंत्रण उपायों के कथित प्रयोग को लेकर हुई सार्वजनिक बहस ने एक बार पुनः लोकतांत्रिक शासन से जुड़े एक महत्त्वपूर्ण नैतिक प्रश्न को सामने ला दिया है कि “राज्य नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और गरिमा की रक्षा करते हुए अपनी दंडात्मक शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार करे?” एक संवैधानिक लोकतंत्र में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना राज्य का अनिवार्य दायित्व है। किंतु इसके साथ-साथ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि राज्य शक्ति का प्रयोग आनुपातिक, जवाबदेह, पारदर्शी तथा विधि के शासन के अनुरूप हो। इसलिए सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं के मध्य संतुलन स्थापित करना आज लोक प्रशासन के समक्ष एक प्रमुख नैतिक चुनौती बनकर उभरा है।
राज्य शक्ति की वैधता: एक नैतिक परिप्रेक्ष्य
सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं के मध्य सामंजस्य
निष्कर्ष
राज्य शक्ति के नैतिक प्रयोग का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वह सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में कितना सफल रहा, बल्कि इस आधार पर भी किया जाना चाहिए कि उसने ऐसा करते समय संवैधानिक स्वतंत्रताओं, मानवीय गरिमा और विधि के शासन का कितना सम्मान किया। जवाबदेही, आनुपातिकता, पारदर्शिता तथा नागरिक स्वतंत्रताओं के सम्मान पर आधारित शासन व्यवस्था न केवल लोकतांत्रिक वैधता को सुदृढ़ करती है, बल्कि नागरिकों के विश्वास को भी मजबूत करती है...और यही प्रत्येक संवैधानिक लोकतंत्र की सबसे बड़ी नैतिक शक्ति है।