प्रौद्योगिकी, धारणीयता और भारत की विकास यात्रा: समन्वय की आवश्यकता

जब विश्व के देश प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, तब पृथ्वी पर इसके पर्यावरणीय प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। भारत के सामने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य के साथ अपनी विश्वसनीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की चुनौती भी है। ऐसे में प्रश्न प्रौद्योगिकी और धारणीयता में से किसी एक को चुनने का नहीं, बल्कि दोनों के समन्वय से विकास का ऐसा मॉडल तैयार करने का है, जो आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय संरक्षण को साथ लेकर चले।

घरेलू प्रौद्योगिकीय क्षमता का निर्माण

  • भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास रणनीतिक विनिर्माण के घरेलूकरण (Strategic Manufacturing Localisation) पर आधारित हैं। उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत 14 क्षेत्रों को शामिल किया गया है, जिसने इलेक्ट्रॉनिक्स और औषधि उत्पादन को देश में बढ़ावा दिया है।
  • सेमीकंडक्टर मिशन के भी परिणाम सामने आने लगे हैं। गुजरात में एक असेंबली एवं परीक्षण संयंत्र 2026 की शुरुआत में परिचालन में आ गया, जबकि धोलेरा में एक प्रमुख फैब्रीकेशन इकाई वाणिज्यिक उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ रही है।
  • इससे महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में आयात-निर्भरता कम करने के साथ-साथ भू-राजनीतिक आघातों के विरुद्ध आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती बढ़ाने में मदद मिलेगी।

विकास मॉडल का हरित रूपांतरण

  • इसी के साथ राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन यह दर्शाता है कि धारणीयता को औद्योगिक रणनीति का अभिन्न हिस्सा बनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य इस्पात और जहाजरानी जैसे ऐसे क्षेत्रों का कार्बन उत्सर्जन कम करना है, जिनका विकार्बनीकरण कठिन है
  • नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का विस्तार, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा तथा विनिर्माण में चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों का समावेशन इस प्रयास को दर्शाता है कि आर्थिक विकास को उत्सर्जन वृद्धि से अलग किया जाए, न कि धारणीयता को बाद की प्राथमिकता माना जाए।

चुनौतियाँ और नीतिगत प्राथमिकताएँ

  • प्रयासों के बावजूद कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं:
    • इलेक्ट्रोलाइज़र की लागत अभी भी अधिक है;
    • क्रिटिकल मिनरल्स के लिए आयात-निर्भरता बनी हुई है; तथा
    • GDP में अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर व्यय प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में कम है।
  • इसलिए भारत को:
    • घरेलू नवाचार पारिस्थितिक तंत्र को और मजबूत करना होगा;
    • हरित प्रौद्योगिकी पेटेंट को प्रोत्साहित करना होगा; तथा
    • औद्योगिक नीति को पर्यावरणीय विनियमन के साथ समन्वित करना होगा, बजाय इसके कि दोनों को अलग-अलग नीति-क्षेत्रों के रूप में देखा जाए।

निष्कर्ष

वास्तविक आत्मनिर्भरता का आकलन केवल निर्मित कारखानों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि क्या ये कारखाने भारत को एक सतत विकास पथ पर आगे बढ़ा रहे हैं। भारत के लिए अवसर यह सिद्ध करने में है कि आत्मनिर्भरता और धारणीयता परस्पर विरोधी लक्ष्य नहीं, बल्कि सतत एवं समावेशी विकास की एकीकृत राह हैं।