नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन ने उस प्रश्न को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है, जो लंबे समय से इस समूह के विकास के केंद्र में रहा है, कि क्या ग्लोबल साउथ का बढ़ता प्रतिनिधित्व अब वैश्विक शासन को प्रभावित करने वाली वास्तविक शक्ति में बदल सकता है? नई दिल्ली घोषणा ने संयुक्त राष्ट्र प्रणाली, ब्रेटन वुड्स संस्थाओं और वैश्विक आर्थिक शासन में सुधार के माध्यम से अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, जवाबदेह और उत्तरदायी बहुपक्षीय व्यवस्था की आवश्यकता पर बल दिया है। भारत ने इस विचार को और आगे बढ़ाते हुए ग्लोबल साउथ को केवल “नियमों का पालन करने वाले” (Rule-Takers) से “नियमों को आकार देने वाले” (Rule-Shapers) की भूमिका में लाने का आह्वान किया है।
प्रतिनिधित्व से वास्तविक निर्णयकारी भूमिका तक
नियम-निर्माण की चुनौती
केवल अधिक प्रतिनिधित्व अपने-आप प्रभाव सुनिश्चित नहीं करता। BRICS के भीतर भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं, आर्थिक हितों और पश्चिमी देशों के साथ संबंधों को लेकर पर्याप्त विविधता मौजूद है। इसलिए वैश्विक नियमों को आकार देने की उसकी क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह व्यापक सहमति को समन्वित रुख और व्यावहारिक संस्थागत प्रस्तावों में कितना प्रभावी ढंग से बदल पाता है।
अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की ओर
BRICS द्वारा मौजूदा वैश्विक संस्थाओं का स्थान ले लेना न तो निकट भविष्य में संभव है और न ही यह उसका प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। उसकी वास्तविक प्रासंगिकता इन संस्थाओं में भीतर से सुधार लाने और वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी का दायरा बढ़ाने में है। यदि BRICS अपनी सामूहिक आर्थिक और जनसांख्यिकीय शक्ति को विश्वसनीय संस्थागत सुधारों में बदल पाता है, तो वह ग्लोबल साउथ को वैश्विक शासन की परिधि से निकालकर नियम-निर्माण की प्रक्रिया के केंद्र के अधिक निकट ला सकता है।