पश्चिमी घाट में जैव विविधता का क्षरण : गहराता पारिस्थितिक संकट

पश्चिमी घाट (Western Ghats) विश्व के सर्वाधिक समृद्ध जैव विविधता हॉटस्पॉट्स में से एक है, जो असाधारण वनस्पति एवं जीव विविधता का पोषण करता है तथा जल सुरक्षा एवं जलवायु संतुलन के माध्यम से करोड़ों लोगों के जीवन को सहारा प्रदान करता है। किंतु हालिया सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि तीव्र पारिस्थितिक क्षरण के कारण यहां जैव विविधता का चिंताजनक ह्रास हो रहा है, जो न केवल पर्यावरणीय स्थिरता बल्कि मानव आजीविका के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है।

जैव विविधता क्षरण के कारण

  • वनों की कटाई एवं आवास विखंडन: बागानों के विस्तार, खनन, राजमार्ग निर्माण तथा शहरीकरण के कारण वनों का विखंडन बढ़ा है, जिससे स्थानिक (Endemic) प्रजातियों के प्राकृतिक आवासों के बीच संपर्क कमजोर हुआ है।
  • अस्थिर विकासात्मक गतिविधियां: जलविद्युत परियोजनाएं, खनन गतिविधियां, पत्थर खदानें तथा अतिक्रमण जैसी गतिविधियों ने संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाला है।
  • जलवायु परिवर्तन एवं मानवीय दबाव: अनियमित वर्षा, बढ़ते तापमान, वनाग्नि तथा अनियंत्रित पर्यटन ने प्रजातियों की संवेदनशीलता और पारिस्थितिक असंतुलन को और तीव्र किया है।

उपचारात्मक उपाय

  • पारिस्थितिक शासन को सुदृढ़ बनाना: पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से संबंधित विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों को कठोर पर्यावरणीय विनियमों तथा वैज्ञानिक भू-उपयोग योजना के माध्यम से प्रभावी रूप से लागू किया जाना चाहिए।
  • समुदाय-केंद्रित संरक्षण: स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन, ईको-टूरिज्म तथा सतत कृषि से जोड़कर संरक्षण और आजीविका के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
  • पुनर्स्थापन एवं सतत विकास: देशज प्रजातियों के साथ वनीकरण, वन्यजीव गलियारों की बहाली तथा जलवायु-सहिष्णु विकास मॉडल को बढ़ावा देना दीर्घकालिक पारिस्थितिक सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

निष्कर्ष

पश्चिमी घाट में जैव विविधता संकट विकास और पारिस्थितिक स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित करने की व्यापक चुनौती को प्रतिबिंबित करता है। इस महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण भारत की पर्यावरणीय सहनशीलता तथा सतत भविष्य के लिए अनिवार्य है।