पश्चिमी घाट ESA योजना: संरक्षण की अनिवार्यता और सहमति की चुनौती

केंद्र सरकार एक बार फिर पश्चिमी घाट में पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (Ecologically Sensitive Areas-ESA) को अधिसूचित करने का प्रयास कर रही है। पश्चिमी घाट विश्व के 8 प्रमुख जैव-विविधता हॉटस्पॉट्स में से एक है। प्रस्तावित योजना का उद्देश्य संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करना है, किंतु विभिन्न राज्यों के विरोध के कारण इसका क्रियान्वयन एक दशक से अधिक समय से लंबित है।

पश्चिमी घाट का संरक्षण क्यों आवश्यक है?

  • पश्चिमी घाट लगभग 1,500 किमी तक फैला हुआ है और 6 राज्यों में विस्तृत होने के साथ-साथ यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।
  • यह क्षेत्र पौधों, जीव-जंतुओं और उभयचरों की हजारों स्थानिक (Endemic) प्रजातियों का आश्रय स्थल है, जिनमें से अनेक विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही हैं।
  • पश्चिमी घाट भारतीय मानसून को प्रभावित करता है तथा गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी प्रमुख प्रायद्वीपीय नदियों का उद्गम स्थल है।
  • यह जल सुरक्षा, जलवायु विनियमन और मृदा संरक्षण जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकीय सेवाएं प्रदान करता है।
  • तीव्र शहरीकरण, खनन, उत्खनन और वनों की कटाई ने इस क्षेत्र की पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता को बढ़ा दिया है।

ESA योजना में क्या प्रस्तावित है?

  • ऐसे पारिस्थितिकीय रूप से नाजुक क्षेत्रों की पहचान, जिन्हें अतिरिक्त पर्यावरणीय संरक्षण की आवश्यकता है।
  • खनन, उत्खनन, ताप विद्युत संयंत्रों तथा अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध।
  • सतत कृषि, पारिस्थितिकी-पर्यटन (Eco-tourism) तथा आजीविका-अनुकूल संरक्षण उपायों को प्रोत्साहन।
  • विशेष रूप से माधव गाडगिल समिति और के. कस्तूरीरंगन समिति की प्रमुख सिफारिशों को अपनाना।

राज्यों का विरोध क्यों है?

  • विकास परियोजनाओं और आधारभूत संरचना विस्तार पर संभावित प्रतिबंधों को लेकर चिंता।
  • किसानों, बागान मालिकों और स्थानीय आजीविकाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका।
  • ESA की सीमाओं और उनके परिसीमन को लेकर विवाद।
  • राज्यों की मांग है कि योजना के क्रियान्वयन में व्यापक परामर्श और क्षेत्र-विशिष्ट लचीलापन सुनिश्चित किया जाए।

भविष्य की राह

वैज्ञानिक संरक्षण, सहभागी शासन और स्थानीय आजीविकाओं की सुरक्षा को साथ लेकर चलने वाला संतुलित दृष्टिकोण ही इस चुनौती का समाधान प्रस्तुत कर सकता है। पश्चिमी घाट का संरक्षण केवल जैव-विविधता की रक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि भारत की दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय स्थिरता, जल सुरक्षा और सतत विकास से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है।