वन हेल्थ दृष्टिकोण तथा महामारियों के प्रति भारत की तैयारी

मध्य अफ्रीका में इबोला के दोबारा उभरते प्रकोप ने भारत की ‘ज़ूनोटिक स्पिलओवर’ (पशुओं से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों) के प्रति संवेदनशीलता और हमारी तैयारियों पर तत्काल आत्ममंथन की आवश्यकता को बढ़ा दिया है। विविध पारिस्थितिक तंत्र और तीव्र शहरीकरण के बीच, भारत ने निपा, क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (KFD), H1N1 और कोविड-19 जैसी बड़ी आपदाओं का सामना किया है। इन बीमारियों के मूल में प्राकृतिक आवासों का विनाश, वन्यजीव तस्करी और जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर कारण छिपे हैं।

नीतिगत एवं संस्थागत ढांचा

  • राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन: केंद्र सरकार ने वर्ष 2024 में ‘नेशनल वन हेल्थ मिशन’ को मंजूरी दी, जिसका संचालन ‘नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ वन हेल्थ’ तथा अंतर-मंत्रालयी कार्यबल के माध्यम से किया जा रहा है।
  • एकीकृत दृष्टिकोण: इसका उद्देश्य मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य क्षेत्रों के बीच डेटा का समन्वय कर निगरानी प्रणाली और ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ (समयपूर्व चेतावनी) को सुदृढ़ करना है।

मिशन की प्रमुख उपलब्धियाँ

  • शासन ढांचा: वन हेल्थ प्रशासनिक तंत्र को सुदृढ़ करने हेतु मॉडल गवर्नेंस फ्रेमवर्क का विकास।
  • आधुनिक तकनीक: बेहतर रोग पहचान के लिए जीनोमिक्स एवं मेटाजीनोमिक्स आधारित निगरानी नेटवर्क की शुरुआत।
  • सक्रिय निगरानी: मानव-पशु-पर्यावरण अंतर्संबंध वाले क्षेत्रों, जैसे चिड़ियाघरों, पक्षी अभयारण्यों एवं बूचड़खानों में निगरानी पहलों का शुभारंभ।
  • जन-भागीदारी: ‘नेशनल वन हेल्थ असेंबली’ जैसी पहलों के माध्यम से जन-जागरूकता एवं युवाओं की सहभागिता को बढ़ावा।

महामारियों के प्रति भारत की तैयारी: प्रमुख अंतराल

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे का कमजोर होना।
  • प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों और विशेषज्ञों की भारी कमी।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च का कम स्तर।
  • राज्यों की असमान संस्थागत क्षमता।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच और शहरी-ग्रामीण असमानता।
  • विभिन्न विभागों के बीच ‘वन हेल्थ’ समन्वय का अभाव।
  • भ्रामक सूचनाओं (Misinformation) के प्रबंधन की चुनौती।

निष्कर्ष

भारत का ‘वन हेल्थ’ ढांचा सैद्धांतिक रूप से तो बेहद सशक्त है, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इसका कार्यान्वयन अभी भी असमान है। समय की मांग है कि अगली किसी भी महामारी की दस्तक से पहले, नीतिगत संकल्पों को जिला स्तर की जमीनी तैयारी में बदला जाए।