नगरपालिकीय ठोस अपशिष्ट: भारत का छिपा हुआ आर्थिक अवसर
भारत प्रतिदिन लगभग 1,70,000 टन नगरपालिकीय ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करता है, लेकिन इसका चौंकाने वाला 40% हिस्सा खुले में फेंक दिया जाता है, जला दिया जाता है या शहरों के बाहरी क्षेत्रों में बढ़ते कचरे के पहाड़ों में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। यह केवल पर्यावरणीय विफलता नहीं है, बल्कि उस समय एक मूल्यवान आर्थिक संसाधन की बर्बादी भी है, जब भारत वर्ष 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखता है।
खंडित अपशिष्ट प्रबंधन तंत्र
- कानूनी ढाँचे की कमी नहीं: भारत के पास ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) ढाँचे, जैव-मीथेनीकरण पहल तथा नगर निकायों की क्षमता निर्माण से जुड़ी योजनाएँ मौजूद हैं।
- संसाधन के दृष्टिकोण का अभाव: आवश्यकता एक ऐसे समेकित दृष्टिकोण की है, जो अपशिष्ट को रसोई के डिब्बे से लेकर पुनर्चक्रणकर्ता के द्वार तक एक संसाधन के रूप में देखे और उसकी पूरी यात्रा पर नजर रखे।
- वर्तमान में अपशिष्ट को संसाधन प्रवाह (Resource Stream) के रूप में प्रबंधित करने के बजाय मुख्यतः निपटान की समस्या के रूप में देखा जाता है। यही वैचारिक अंतर आगे के सभी हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता को कमजोर करता है।
जवाबदेही की कड़ी को मजबूत करना
- नियामकीय पहल: हाल ही में अधिसूचित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम एक बदलाव का संकेत देते हैं। इनमें चार प्रकार के अपशिष्ट का पृथक्करण, बड़े अपशिष्ट उत्पादकों की डिजिटल निगरानी तथा अपशिष्ट डंप करने को हतोत्साहित करने के लिए अधिक लैंडफिल शुल्क का प्रावधान है।
- कार्यान्वयन की वास्तविकता: हालांकि, केवल नियम ऐसी समस्या का समाधान नहीं कर सकते, जिसकी मूल चुनौती उनके प्रभावी कार्यान्वयन से जुड़ी है:
- पृथक किया गया अपशिष्ट परिवहन के दौरान फिर से मिला दिया जाता है;
- प्रसंस्करण संयंत्र अपनी क्षमता से कम पर संचालित होते हैं; तथा
- घर से निकलने के बाद अपशिष्ट की जवाबदेही की कड़ी कमजोर पड़ जाती है।
अपशिष्ट से उत्पादक संसाधन पुनर्प्राप्ति की ओर
- प्रबंधन से पहले मापन: वास्तविक चक्रीय अर्थव्यवस्था के लिए उत्पन्न, पृथक और पुनर्प्राप्त किए गए अपशिष्ट से संबंधित विश्वसनीय आँकड़े आवश्यक हैं।
- पूरी प्रक्रिया की अखंडता बनाए रखना: घर से लेकर प्रसंस्करण केंद्र तक अपशिष्ट के पृथक्करण की निरंतरता सुनिश्चित करनी होगी।
- स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीक: केवल दिखावटी बड़े संयंत्रों के बजाय विकेंद्रीकृत और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल तकनीकों को प्राथमिकता देनी होगी।
- सत्यापित पुनर्प्राप्ति को प्रोत्साहन: केवल कागजी अनुपालन के बजाय बाजार-आधारित प्रोत्साहनों के माध्यम से वास्तविक और सत्यापित संसाधन पुनर्प्राप्ति को पुरस्कृत करना होगा।
निष्कर्ष
अपशिष्ट केवल भारत की
निपटान की समस्या नहीं, बल्कि
संसाधनों को पुनर्प्राप्त करने का अवसर है। नियामकीय उद्देश्यों को एक जवाबदेह संसाधन-आधारित अर्थव्यवस्था में बदलना यह तय करेगा कि 2047 तक भारत अपने अपशिष्ट का प्रभावी प्रबंधन कर रहा होगा या अपनी आर्थिक एवं पर्यावरणीय क्षमता को यूँ ही दफन करता रहेगा।