बिश्केक में आयोजित 26वें SCO शिखर सम्मेलन ने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के समक्ष मौजूद एक कठिन कूटनीतिक चुनौती को फिर से रेखांकित किया है। एक ओर भारत अमेरिका, यूरोप, इज़राइल और हिन्द-प्रशांत साझेदार देशों के साथ अपने संबंधों को गहरा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह ऐसे यूरेशियाई मंच में सक्रिय है, जिसमें रूस, चीन और ईरान भी शामिल हैं। यह अपने-आप में कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि गुटीय राजनीति के बजाय मुद्दे-आधारित साझेदारियों को प्राथमिकता देने की भारत की विदेश नीति को दर्शाता है। किंतु गहराते भू-राजनीतिक विभाजनों के बीच इस लचीलेपन को बनाए रखना लगातार कठिन होता जा रहा है। ईरान पर सैन्य हमलों और एकतरफा प्रतिबंधात्मक उपायों की बिश्केक घोषणा में की गई निंदा इस चुनौती को स्पष्ट करती है, क्योंकि भारत को SCO की सामूहिक सहमति में भाग लेते हुए अपनी व्यापक रणनीतिक साझेदारियों के साथ भी संतुलन बनाए रखना होता है।
प्रतिस्पर्धी रणनीतिक क्षेत्रों के मध्य संतुलन
भारत के लिए SCO की प्रासंगिकता क्यों बनी हुई है
इन जटिलताओं के बावजूद भारत SCO को केवल एक कठिन कूटनीतिक मंच मानकर उससे दूरी नहीं बना सकता। यह भारत को मध्य एशिया के साथ निरंतर संस्थागत संपर्क, रूस और ईरान के साथ संवाद तथा महाद्वीपीय रणनीतिक पहुँच का अवसर देता है। चाबहार और व्यापक संपर्क पहलों के कारण यह यूरेशियाई जुड़ाव भारत के लिए और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
रणनीतिक स्वायत्तता की वास्तविक कसौटी
भारत के सामने चुनौती SCO और अपनी पश्चिमी साझेदारियों में से किसी एक को चुनने की नहीं, बल्कि दोनों रणनीतिक क्षेत्रों में सार्थक रूप से सक्रिय बने रहने की है। उसकी रणनीतिक स्वायत्तता अंततः इस क्षमता पर निर्भर करेगी कि वह जहाँ उसके हित हों वहाँ सहयोग करे, जहाँ आवश्यक हो वहाँ अलग रुख अपनाए, और प्रतिस्पर्धी भू-राजनीतिक समीकरणों को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के विकल्प सीमित न करने दे।