क्या भारत में 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए?

दुनिया के अनेक देश नाबालिगों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध या आयु-आधारित नियंत्रण लागू कर रहे हैं। ऐसे में भारत के सामने भी यह प्रश्न है कि क्या उसे इस वैश्विक नियामकीय प्रवृत्ति का अनुसरण करना चाहिए, या फिर बाल सुरक्षा, डिजिटल अधिकारों और व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच संतुलन स्थापित करने वाला दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

वैश्विक परिदृश्य

  • ब्राज़ील और इंडोनेशिया 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू कर चुके हैं।
  • यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और तुर्किये ने 15 या 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को लक्षित करने वाले कानून बनाए हैं।
  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया तक पहुंच सीमित कर दी है।
  • कनाडा और स्पेन भी 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए नियामकीय ढांचा तैयार कर रहे हैं।
  • यह दर्शाता है कि विश्व स्तर पर केवल प्लेटफॉर्म की स्वैच्छिक निगरानी के बजाय कानूनी आयु-सीमा लागू करने की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है।

प्रतिबंध के पक्ष में तर्क

  • अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग और चिंता, नींद में व्यवधान तथा शारीरिक छवि (Body Image) संबंधी समस्याओं के बीच संबंध दर्शाने वाले प्रमाण एहतियाती कदम उठाने का आधार प्रदान करते हैं।
  • ऐसा प्रतिबंध बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देगा तथा सोशल मीडिया कंपनियों को आयु-उपयुक्त प्लेटफॉर्म डिजाइन अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।

क्रियान्वयन की चुनौती

  • भारत जैसी विशाल आबादी वाले देश में प्रभावी आयु-सत्यापन व्यवस्था के अभाव में ऐसा प्रतिबंध केवल प्रतीकात्मक बनकर रह सकता है।
  • पूर्ण प्रतिबंध बच्चों को कम निगरानी वाले या अनियमित डिजिटल प्लेटफॉर्म के उपयोग की दिशा में अग्रसर कर सकता है।
  • आधार-आधारित आयु-सत्यापन डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के तहत निजता संबंधी चिंताएं भी उत्पन्न कर सकता है।

संतुलित विकल्प

  • पूर्ण प्रतिबंध के बजाय भारत चरणबद्ध एवं नियंत्रित पहुंच (Graded Access Model) की नीति अपना सकता है, जिसमें विशेष ध्यान निम्न बिंदुओं पर हो:
  • oअभिभावकीय सहमति (Parental Consent) को अनिवार्य बनाना।
  • oएल्गोरिदम की पारदर्शिता (Algorithmic Transparency) सुनिश्चित करना।
  • oबच्चों को आकर्षित करने वाली व्यसनकारी (Addictive) डिजाइन विशेषताओं के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करना।
  • यह दृष्टिकोण वैश्विक नियामकीय प्रवृत्ति के अनुरूप है, जिसमें पूर्ण प्रतिबंध की अपेक्षा प्लेटफॉर्म की जवाबदेही को अधिक महत्व दिया जा रहा है।

निष्कर्ष

जब विश्व के अनेक देश इस दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं, तब भारत के लिए सबसे उपयुक्त मार्ग सह-नियमन (Co-regulation) का हो सकता है, जिसमें प्रभावी आयु-सत्यापन, अभिभावकों को सशक्त बनाने तथा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही सुनिश्चित करने के माध्यम से बच्चों की सुरक्षा और डिजिटल समावेशन के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।