क्या भारत गहरे समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों के उत्तरदायी शासन में वैश्विक नेतृत्व कर सकता है

गहरे समुद्री अन्वेषण में भारत की बढ़ती क्षमताएँ केवल प्रौद्योगिकी और संसाधनों तक पहुँच का अवसर नहीं दे रही हैं, बल्कि गहरे समुद्र के शासन और उसके उपयोग की दिशा को आकार देने का भी अवसर प्रदान कर रही हैं। भारत के पास वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय समुद्रतल प्राधिकरण (ISA) के तीन अन्वेषण अनुबंध हैं, जो मध्य हिन्द महासागर बेसिन, सेंट्रल इंडियन रिज और कार्ल्सबर्ग रिज से जुड़े हैं। डीप ओशन मिशन, मत्स्य-6000 और विस्तृत होते जैव विविधता अनुसंधान के साथ भारत के पास यह दिखाने का मजबूत आधार है कि वाणिज्यिक दोहन से पूर्व पारिस्थितिक सावधानी गहरे समुद्री विकास का मार्गदर्शन कर सकती है।

सावधानी को पहला सिद्धांत बनाना आवश्यक

  • गहरे समुद्र के पारिस्थितिक तंत्रों के बारे में हमारी समझ अभी सीमित है, जबकिसमुद्रतल में हस्तक्षेप ऐसे नुकसान उत्पन्न कर सकता है जिन्हें पलटना कठिन हो।
  • भारत यह सिद्धांत अपना सकता है कि वाणिज्यिक खनन तभी आगे बढ़े, जब ठोस पारिस्थितिक आधाररेखाएँ, संचयी प्रभाव आकलन और स्पष्टनिषिद्ध क्षेत्रीय सीमाएँ निर्धारित हो जाएँ।
  • अन्वेषण और दोहन के बीच स्पष्ट अंतर बना रहना चाहिए; केवल तकनीकी क्षमता खनन के पक्ष में पूर्वधारणा का आधार नहीं बननी चाहिए।

खनिज सुरक्षा के साथ पारिस्थितिक उत्तरदायित्व

  • गहरे समुद्र के खनिज नवीकरणीय ऊर्जा, विद्युत गतिशीलता और उन्नत विनिर्माण के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन निष्कर्षण के औचित्य को पहले पुनर्चक्रण, वैकल्पिक सामग्री, संसाधन दक्षता और चक्रीय अर्थव्यवस्था जैसे विकल्पों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
  • इससे विमर्श केवल इस बात तक सीमित नहीं रहेगा कि खनन से होने वाले नुकसान को कैसे कम किया जाए, बल्कि यह मूल प्रश्न भी सामने आएगा कि गहरे समुद्र में खनन वास्तव में आवश्यक है या नहीं

वैश्विक नियमों का पालन ही नहीं, उन्हें आकार देना जरूरी

भारत अपने वैज्ञानिक प्रमाणों और ISA में भागीदारी का उपयोग जैव विविधता संरक्षण, पर्यावरणीय निगरानी, दायित्व, पारदर्शिता और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के लिए अधिक सुदृढ़ वैश्विक मानकों के पक्ष में कर सकता है।

यदि भारत प्रौद्योगिकीय क्षमता को पारिस्थितिक संयम के साथ संरेखित करता है, तो वह केवल गहरे समुद्री अन्वेषण में भागीदार नहीं, बल्कि वैश्विक महासागरीय शासन के मानदंडों को आकार देने वाला देश बन सकता है। भारत का नेतृत्व इस बात से नहीं मापा जाएगा कि वह गहरे समुद्र से कितना निष्कर्षण कर सकता है, बल्कि इस बात से मापा जाएगा कि वह पृथ्वी के सबसे कम समझे गए पारिस्थितिक तंत्रों में से एक के शासन को कितनी जिम्मेदारी से दिशा दे सकता है।