कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा: प्रगति में बाधक व्यवस्थागत ख़ामियां
कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा (KMGBF) की पहली वैश्विक समीक्षा ने एक चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत की है। इसे अपनाए जाने के कई वर्ष बाद भी विश्व 2030 के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ रहा है। रिपोर्ट वित्तपोषण, शासन और आँकड़ों से जुड़ी व्यवस्थागत कमियों को उजागर करती है। यह स्पष्ट संकेत है कि केवल महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित कर देना पर्याप्त नहीं है; जैव विविधता के क्षरण को रोकने के लिए मजबूत संस्थागत व्यवस्था और प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है।
क्रियान्वयन के साधन: बढ़ता अंतराल
- संसाधन जुटाने, क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में विस्तार हुआ है, लेकिन यह विस्तार राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप अपेक्षित गति से नहीं हुआ है।
- इन साधनों को अलग-अलग और छिटपुट हस्तक्षेपों के रूप में लागू करने के बजाय एक समेकित पैकेज के रूप में बड़े पैमाने पर लागू करने की तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि अलग-अलग प्रयास उनके समग्र प्रभाव को कमजोर कर देते हैं।
हानिकारक सब्सिडी: अभी भी शुरुआती चरण में
- पर्यावरण के लिए हानिकारक प्रोत्साहनों में सुधार की प्रक्रिया अब भी राजनीतिक और पद्धतिगत जटिलताओं से घिरी हुई है।
- अधिकांश देश अभी भी सकारात्मक और हानिकारक वित्तीय प्रवाहों की अलग-अलग रिपोर्टिंग करते हैं। इससे उन्हीं क्षेत्रों में सब्सिडी जारी रहती है, जिन्हें सुधार के लिए लक्षित किया गया है।
- परिणामस्वरूप, संसाधनों को जैव विविधता के लिए सकारात्मक परिणाम देने वाले क्षेत्रों की ओर पुनर्निर्देशित करने का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
समूचे समाज की भागीदारी: अप्रयुक्त क्षमता का दोहन
- गैर-राज्यीय अभिकर्ता, जिनमें आदिवासी जनजातियाँ तथा स्थानीय समुदाय शामिल हैं, आधिकारिक रिपोर्टिंग में अब भी हाशिए पर हैं। केवल लगभग एक-तिहाई राष्ट्रीय लक्ष्यों में उनकी भूमिका को स्वीकार किया गया है।
- सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन्हें केवल हितधारकों के रूप में देखने के बजाय सक्रिय भागीदारों के रूप में स्वीकार किया जाए।
- इसके लिए ऐसी व्यवस्थाएँ भी आवश्यक हैं, जो उनके पारिस्थितिकीय प्रभाव को व्यवस्थित रूप से दर्ज और माप सकें।
निगरानी एवं विज्ञान-नीति का एकीकरण
- निम्नलिखित कारक साक्ष्य-आधारित प्रगति की निगरानी में बाधा डाल रहे हैं:
- बिखरे हुए आँकड़े;
- दाता-निर्भर सांख्यिकीय प्रणालियाँ; तथा
- वैज्ञानिक आकलनों के साथ कमजोर समन्वय।
- राष्ट्रीय निगरानी अवसंरचना को मजबूत करना और अनुसंधान के एजेंडे को रिपोर्टिंग से जुड़ी कमियों के अनुरूप बनाना द्वितीय वैश्विक समीक्षा से पहले प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में रेखांकित किया गया है।
निष्कर्ष
KMGBF की पहली वैश्विक समीक्षा केवल कमियों पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट नहीं है, बल्कि
दिशा-सुधार का स्पष्ट आह्वान है। वित्तपोषण, हानिकारक सब्सिडी में सुधार, समावेशी शासन और डेटा प्रणालियाँ, सभी मोर्चों पर प्रगति अपेक्षा से पीछे है। ऐसे में 2030 तक के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नई प्रतिबद्धताओं से अधिक आवश्यकता उन
मजबूत संस्थागत क्षमताओं की है, जो पहले से किए गए वादों और प्रतिबद्धताओं को वास्तविक धरातल पर लागू कर सकें; क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि जैव विविधता का लगातार होता क्षरण सुधार की संभावनाओं को ही समाप्त कर दे।