कोयला गैसीकरण एवं भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता
भारत ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ने के बीच एक जटिल संतुलन साधने का प्रयास कर रहा है। ऐसे समय में कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन प्रौद्योगिकी के रूप में उभर रहा है, जो देश के प्रचुर कोयला भंडार का उपयोग करते हुए ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति और पर्यावरणीय लागतों के बीच संतुलन स्थापित करने की क्षमता रखता है।
कोयला गैसीकरण क्या है?
- कोयला गैसीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें ठोस कोयले को भाप और ऑक्सीजन की नियंत्रित अभिक्रिया के माध्यम से संश्लेषित गैस (सिनगैस) में परिवर्तित किया जाता है।
- यह सिनगैस मुख्यतः हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड का मिश्रण होती है।
- इसके आधार पर यूरिया, अमोनिया, मेथनॉल तथा अन्य रासायनिक उत्पादों का निर्माण किया जा सकता है।
गैसीकरण के पक्ष में तर्क
- भारत के पास लगभग 401 अरब टन कोयला तथा 47 अरब टन लिग्नाइट के विशाल भंडार हैं, फिर भी देश अपनी यूरिया आवश्यकता का लगभग 5वां हिस्सा, अमोनिया की लगभग पूरी मांग तथा मेथनॉल की 80-90 प्रतिशत आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी करता है।
- कोयला गैसीकरण इस विरोधाभास को दूर करने का अवसर प्रदान करता है।
- इसके माध्यम से घरेलू कोयला संसाधनों का उपयोग कर उर्वरकों, रसायनों और कृत्रिम ईंधनों का उत्पादन किया जा सकता है, जिससे आयात निर्भरता में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
- इस दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन से स्पष्ट होती है, जिसके अंतर्गत वर्ष 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले के गैसीकरण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में चुनौतियां
- भारतीय कोयले में राख (Ash) की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है, उसका ऊष्मीय मान असमान होता है तथा उसमें जटिल खनिज पदार्थ पाए जाते हैं।
- इन कारणों से फ्लुइडाइज़्ड-बेड गैसीकरण तकनीक अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त मानी जाती है।
- कोयला गैसीकरण परियोजनाओं में प्रारंभिक निवेश अत्यधिक होता है और इनकी परिपक्वता अवधि भी लंबी होती है, जिससे निजी निवेशकों की रुचि सीमित रहती है।
- प्रौद्योगिकी के परिपक्व होने के बाद भी उन्नत तकनीकों के लिए बाह्य स्रोतों पर निर्भरता बनी रहती है, जो इस क्षेत्र में भारत की स्वदेशी क्षमता की सीमाओं को उजागर करती है।
निष्कर्ष
भारत के विशाल कोयला संसाधनों और रसायनों एवं उर्वरकों के क्षेत्र में बनी हुई आयात निर्भरता के बीच की खाई को पाटने के लिए केवल संसाधन-संपन्नता पर्याप्त नहीं है। इसके लिए स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास, निजी निवेश को प्रोत्साहित करने वाली नीतिगत संरचना तथा प्रभावी संस्थागत समन्वय को समानांतर रूप से सुदृढ़ करना होगा। तभी कोयला गैसीकरण भारत की ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक आत्मनिर्भरता का एक मजबूत आधार बन सकेगा।