खाद्यान्न पर्याप्तता से आगे: भारत में पोषण सुरक्षा की चुनौती

विश्व खाद्य दिवस 2026 का विषय ‘आज नवाचार, कल पोषण’ विकास से जुड़े एक बुनियादी विरोधाभास को रेखांकित करता है—खाद्यान्न की प्रचुर उपलब्धता आवश्यक रूप से बेहतर पोषण सुनिश्चित नहीं करती। विश्व में लगभग 2.7 अरब लोग पौष्टिक आहार का खर्च वहन करने में असमर्थ हैं। ऐसे में कैलोरी-केंद्रित खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर किफायती एवं विविधतापूर्ण पोषण सुनिश्चित करना आवश्यक है।

संरचनात्मक असंतुलन

  • भारत की कृषि नीतियों में ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद और रियायती वितरण के माध्यम से अनाज उत्पादन को प्राथमिकता दी गई है। इससे खाद्यान्न उपलब्धता तो बढ़ी, लेकिन दलहन, फल एवं सब्जियों के उत्पादन को अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिला।
  • परिणामस्वरूप, कृषि उत्पादन में वृद्धि के अनुपात में पोषण संबंधी उपलब्धियाँ सीमित रहीं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार, 35.5% बच्चे ठिगनेपन से प्रभावित थे, जो बहुआयामी वंचना की निरंतरता दर्शाता है।

उत्पादन से आगे: वहनीयता का प्रश्न

  • पोषण असुरक्षा एक आर्थिक एवं संस्थागत चुनौती भी है। वैश्विक स्तर पर उपभोक्ता खाद्य लागत का 70–75% हिस्सा खेत से बाजार तक की गतिविधियों से संबंधित है।
  • इससे स्पष्ट है कि उत्पादन बढ़ाना मात्र पर्याप्त नहीं है। कमजोर आपूर्ति शृंखलाएँ, शीत भंडारण की कमी और खंडित बाजार पोषक खाद्य पदार्थों को महँगा बनाते हैं।
  • इसके अतिरिक्त, अपर्याप्त स्वच्छता, मातृ कुपोषण और परिवार के भीतर भोजन का असमान वितरण भी पोषण संबंधी उपलब्धियों को सीमित करते हैं।

नीतिगत प्राथमिकताओं का पुनर्निर्धारण

  • पोषण-संवेदी कृषि के लिए फसल विविधीकरण, जलवायु-अनुकूल खेती और बागवानी मूल्य शृंखलाओं में निवेश आवश्यक है।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत खाद्यान्न अधिकारों के साथ पीएम पोषण और सक्षम आँगनवाड़ी के माध्यम से आहार विविधता बढ़ाई जानी चाहिए।
  • साथ ही, तकनीकी नवाचार को संस्थागत सुधारों से जोड़कर छोटे किसानों की बाजार तक पहुँच और उपभोक्ताओं के लिए खाद्य पदार्थों की वहनीयता सुनिश्चित करनी होगी।

निष्कर्ष

सतत विकास लक्ष्य-2 की प्राप्ति के लिए खाद्य सुरक्षा का आकलन केवल अनाज भंडार और वितरण कवरेज से नहीं, बल्कि आहार की गुणवत्ता, वहनीयता और पोषण संबंधी परिणामों से करना होगा। भारत की अगली कृषि क्रांति में उत्पादक प्रोत्साहनों, उपभोक्ता कल्याण और पारिस्थितिकीय स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित करते हुए पोषण सुरक्षा को विकास नीति के केंद्र में रखना आवश्यक है।