कागज़ों पर कानून, ज़मीनी स्तर पर लापरवाही: भारत में औद्योगिक सुरक्षा पर पुनर्विचार

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा हाल ही में यह जानकारी दी गई कि वर्ष 2025–26 के दौरान मात्र 17 महीनों में 196 श्रमिकों की औद्योगिक दुर्घटनाओं में मृत्यु हुई। इसने भारत में कार्यस्थल सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताओं को एक बार पुनः उजागर कर दिया है। यह कोई अकेली घटना नहीं है; झारखंड की कोयला खदानों, गुजरात के रासायनिक संयंत्रों और तमिलनाडु के बॉयलर विस्फोटों जैसी घटनाएँ बार-बार यह दर्शाती हैं कि कानूनी प्रावधानों और उनके प्रभावी क्रियान्वयन के बीच अब भी गहरी खाई मौजूद है।

औद्योगिक दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण

  • अधिकांश दुर्घटनाएँ पुरानी मशीनरी, अपर्याप्त सुरक्षा ऑडिट तथा जोखिमपूर्ण कार्यों के बढ़ते संविदाकरण (Contractualisation) के कारण होती हैं, जिससे जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है।
  • श्रम निरीक्षण प्रणाली का कमजोर क्रियान्वयन, नियामक संस्थाओं में कर्मचारियों की कमी तथा ‘सुरक्षा से अधिक उत्पादन’ की कार्य-संस्कृति दुर्घटनाओं के जोखिम को बढ़ाती है।
  • प्रवासी एवं असंगठित क्षेत्र के श्रमिक, जिन्हें प्रायः पर्याप्त प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं होते, सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

मौजूदा नीतिगत व्यवस्था

  • भारत में कार्यस्थल सुरक्षा के लिए कारखाना अधिनियम, 1948, खान अधिनियम, 1952 तथा व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशाएँ संहिता, 2020 लागू हैं, जिसने पूर्व के 13 श्रम कानूनों का एकीकरण किया है।
  • राज्यों को नियमित सुरक्षा ऑडिट, दुर्घटना रिपोर्टिंग प्रणाली तथा कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के अंतर्गत मुआवज़ा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है।
  • इसके बावजूद विभिन्न राज्यों में इन प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी असमान बना हुआ है।

आगे की राह

बार-बार होने वाली औद्योगिक दुर्घटनाएँ इस बात की मांग करती हैं कि राज्य श्रम विभागों और केंद्रीय नियामक संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए, प्रौद्योगिकी आधारित रियल-टाइम सुरक्षा निगरानी विकसित की जाए तथा राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त स्वतंत्र तृतीय-पक्ष सुरक्षा ऑडिट को अनिवार्य बनाया जाए। वस्तुतः औद्योगिक सुरक्षा केवल कानूनों से सुनिश्चित नहीं हो सकती; इसके लिए रोकथाम-आधारित संस्थागत कार्य-संस्कृति विकसित करना आवश्यक है। जब तक कानूनों के साथ उनका कठोर और प्रभावी क्रियान्वयन नहीं होगा, तब तक भारत की विकास यात्रा टाली जा सकने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं और श्रमिकों की असामयिक मौतों से प्रभावित होती रहेगी।