जलवायु वित्तयन की विडंबना : न्यूनीकरण पर जोर, अनुकूलन की अनदेखी

आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार विकसित देशों ने वर्ष 2022, 2023 एवं 2024 में 100 अरब अमेरिकी डॉलर के वार्षिक जलवायु वित्तयन (Climate Finance) लक्ष्य को पार कर लिया है, जो लंबे समय से अप्राप्य बना हुआ था। किंतु इस उपलब्धि के पीछे एक खंडित वास्तविकता भी विद्यमान है, जिसमें संरचनात्मक असंतुलन, वित्तीय साधनों की विकृतियां तथा वितरण संबंधी विषमताएं शामिल हैं, जो इस दिशा में प्रगति की धारणा को सीमित करती हैं।

न्यूनीकरण हेतु वित्तयन: मात्रा अधिक, विस्तार सीमित

  • जलवायु वित्तयन में न्यूनीकरण या शमन (Mitigation) संबंधी वित्तयन का प्रभुत्व बना हुआ है, जिसकी हिस्सेदारी कुल जलवायु वित्तीय प्रवाह का लगभग दो-तिहाई रही तथा वर्ष 2023 में यह 87.3 अरब अमेरिकी डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।
  • हालांकि, इसमें क्षेत्रीय असंतुलन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वर्ष 2016 से 2024 के दौरान केवल ऊर्जा क्षेत्र ने कुल न्यूनीकरण वित्त का 41% हिस्सा प्राप्त किया।
  • इस वित्तयन का अधिकांश भाग ऋण-आधारित रहा, जिससे उन मध्यम-आय वाले देशों को अधिक लाभ मिला जहां निजी पूंजी को अपेक्षाकृत आसानी से आकर्षित किया जा सकता है। परिणामस्वरूप अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों को अपेक्षित वित्तीय समर्थन नहीं मिल पाया।

अनुकूलन हेतु वित्तयन: उपेक्षित संरचनात्मक आयाम

  • अनुकूलन (Adaptation) हेतु वित्तयन की हिस्सेदारी वर्ष 2020 के 34% से घटकर वर्ष 2024 में मात्र 25% रह गई, जबकि कुल राशि में सीमित वृद्धि दर्ज की गई।
  • वर्ष 2021 के ग्लासगो क्लाइमेट पैक्ट में किए गए अनुकूलन वित्तयन को दोगुना करने के संकल्प को पूरा करने के लिए पर्याप्त अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होगी।
  • अनुकूलन वित्तयन का 90% से अधिक हिस्सा सार्वजनिक स्रोतों से प्राप्त हुआ, जबकि निजी क्षेत्र से वित्तीय योगदान लगभग ठहर गया है।

निष्कर्ष: न्यायसंगत जलवायु वित्तयन की आवश्यकता

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) के कॉप 30 सम्मेलन में ‘जलवायु वित्तयन पर नए सामूहिक परिमाणित लक्ष्य’ (NCQG) के तहत 2035 तक अनुकूलन वित्तयन को कम से कम तीन गुना करने का आह्वान किया गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:

  • अल्प-वित्तपोषण में सुधार: अनुकूलन (Adaptation) के लिए आवंटित धन की कमी को दूर करना।
  • ऋण के बोझ को कम करना: विकासशील और संवेदनशील देशों के लिए ऋण-आधारित वित्तीय साधनों पर निर्भरता घटाना।
  • समान वितरण: वित्त को केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित न रखकर अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक पहुँचाना।