जलवायु न्याय एवं वैश्विक दक्षिण: जलवायु क्षति की कीमत कौन चुकाए?
जलवायु परिवर्तन ने एक बुनियादी असमानता को जन्म दिया है: जिन देशों का संचयी उत्सर्जन में योगदान सबसे कम रहा है, वे अक्सर बाढ़, लू और चक्रवात जैसी आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित होते रहे हैं। इसलिए, जलवायु वित्त से जुड़ी वार्ताओं में जलवायु न्याय (Climate Justice) वैश्विक दक्षिण की प्रमुख मांग बन गया है।
ऐतिहासिक उत्तरदायित्व
- विकसित देशों का संचयी CO₂ उत्सर्जन में सबसे बड़ा योगदान रहा है, जबकि भारत की हिस्सेदारी केवल लगभग 3 से 4% है।
- साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमताएँ (CBDR-RC) तथा प्रदूषक भुगतान सिद्धांत यह मानते हैं कि जिसने जितना अधिक नुकसान किया है, उसे उतनी ही अधिक लागत वहन करनी चाहिए। पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9 के तहत विकसित देशों को जलवायु वित्त उपलब्ध कराने का दायित्व है।
- बहस अब सहायता से आगे बढ़कर हानि एवं क्षति के लिए क्षतिपूर्ति (Compensation for Loss and Damage) की ओर बढ़ गई है।
जलवायु वित्त की वर्तमान स्थिति
- 100 अरब डॉलर की वार्षिक वित्तीय प्रतिबद्धता देर से पूरी हुई और इसका बड़ा हिस्सा ऋणों के रूप में आया, जिससे ऋण का बोझ बढ़ा।
- हानि एवं क्षति कोष (Loss and Damage Fund), जिसकी स्थापना COP27 और COP28 के दौरान आगे बढ़ी, जरूरतों की तुलना में अभी भी बहुत कम है।
- नए सामूहिक परिमाणात्मक लक्ष्य (NCQG), COP29: वर्ष 2035 तक प्रतिवर्ष 300 अरब डॉलर उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया, जिसे विकासशील देशों ने अपर्याप्त बताया।
- अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की 2025 की सलाहकारी राय ने जलवायु संरक्षण के संबंध में राज्यों के बाध्यकारी दायित्वों की पुष्टि की।
कार्बन मूल्य निर्धारण और भारत का रुख
- वित्तीय हस्तांतरण को कार्बन मूल्य निर्धारण से जोड़ने से अतीत की जिम्मेदारी और भविष्य में उत्सर्जन कम करने के प्रोत्साहनों को एक साथ जोड़ा जा सकता है। हालांकि, इसमें ऊर्जा की पहुंच से जुड़ी आवश्यकताओं को ध्यान में रखना और गरीबों के हितों की रक्षा करना आवश्यक होगा।
- भारत जलवायु वित्त को कानूनी दायित्व के रूप में देखता है और इसे अनुदान-आधारित तथा पूर्वानुमेय बनाने की मांग करता है। भारत यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) जैसे एकतरफा उपायों का भी विरोध करता है।
चुनौतियाँ
जलवायु क्षति का किसी विशेष स्रोत से संबंध निर्धारित करना, कोषों से संबंधित शासन तंत्र, वित्त से जुड़ी शर्तें तथा कमजोर लेखांकन व्यवस्था जैसे मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं।
भविष्य की राह
- ऋणों की तुलना में अनुदानों को प्राथमिकता दी जाए।
- पारदर्शी लेखांकन मानकों को अपनाया जाए।
- हानि एवं क्षति कोष में सुधार करते हुए उसका विस्तार किया जाए।
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और अनुकूलन वित्त को सुनिश्चित किया जाए।
निष्कर्ष
जलवायु कार्रवाई विकास के लिए एक और बाधा नहीं बननी चाहिए। जलवायु संकट में जिनका योगदान अधिक रहा है, उन्हें पूर्वानुमेय, पारदर्शी और न्यायसंगत व्यवस्थाओं के माध्यम से इसकी अधिक लागत वहन करनी चाहिए।