जैव-विविधता वित्तपोषण का संकट: प्रतिबद्धताओं और संसाधनों के बीच बढ़ती खाई
वैश्विक पर्यावरणीय शासन लंबे समय से एक बुनियादी विरोधाभास से जूझ रहा है: पर्यावरण को बचाने की आकांक्षाएं तो बढ़ती जा रही हैं, लेकिन इसके लिए मिलने वाला वित्त पीछे छूट जाता है। ‘ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी’ (GEF) की समरकंद बैठकें, जिसमें 24 परियोजनाओं के लिए 232.5 मिलियन डॉलर और GEF-9 के लिए 3.9 बिलियन डॉलर के संकल्प पारित किए गए, इसी तनाव को स्पष्ट करती हैं। यद्यपि यह घोषणा रणनीतिक प्रगति का संकेत देती है, किंतु पृथ्वी के संरक्षण की वास्तविक आवश्यकताएं केवल आश्वासनों से कहीं अधिक संसाधनों की मांग करती हैं।
बढ़ती वित्तीय खाई
- जैव-विविधता संरक्षण के क्षेत्र में प्रतिवर्ष लगभग 700 अरब डॉलर की वित्तीय कमी बनी हुई है, जबकि वर्तमान GEF व्यय वैज्ञानिकों द्वारा आवश्यक बताए गए निवेश का मात्र 0.2 प्रतिशत ही पूरा कर पाता है।
- इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि हर वर्ष लगभग 1.8 ट्रिलियन डॉलर जीवाश्म ईंधन और कृषि सब्सिडी पर खर्च किए जाते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से संरक्षण प्रयासों को कमजोर करते हैं।
- यह स्थिति बहुपक्षीय पर्यावरणीय नीतियों के केंद्र में मौजूद एक आत्म-विरोधी प्रवृत्ति को उजागर करती है।
पृथक दृष्टिकोण से समग्र प्रणाली की ओर
- GEF-9 इस समस्या के समाधान हेतु एक परस्पर संबद्ध संकट ढांचे (Connected Crisis Framework) को अपनाने का प्रयास करता है, जिसके तहत परियोजनाओं को जैव-विविधता, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसी चुनौतियों का पृथक-पृथक नहीं, बल्कि एकीकृत रूप से समाधान करना होगा।
- विशेष रूप से, समुदाय-आधारित और स्वदेशी समुदायों द्वारा संचालित संरक्षण प्रयासों को संरचनात्मक मान्यता प्रदान की गई है। यह एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि विश्व की शेष जैव-विविधता का अत्यधिक बड़ा भाग स्वदेशी समुदायों के क्षेत्रों में संरक्षित है।
- सत्यापित पारिस्थितिकीय परिणामों से जुड़े संरक्षण बॉन्ड (Conservation Bonds) निजी पूंजी को आकर्षित करने का एक आशाजनक, यद्यपि अभी तक व्यापक रूप से अपरीक्षित, वित्तीय साधन बनकर उभर रहे हैं।
गुणक प्रभाव: प्रभावशीलता की वास्तविक कसौटी
GEF की वास्तविक सफलता उसके गुणक प्रभाव (Multiplier Effect) पर निर्भर करेगी; अर्थात् वह किस सीमा तक सार्वजनिक वित्तीय प्रतिबद्धताओं का उपयोग करके बड़े पैमाने पर निजी तथा संप्रभु निवेश को प्रेरित कर पाता है। यदि यह लक्ष्य प्राप्त नहीं होता, तो नई वित्तीय घोषणाएं केवल प्रतीकात्मक उपलब्धियां बनकर रह जाएंगी।
वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है जब संरक्षण को आर्थिक विकास की परिधि में स्थित एक गौण विषय न मानकर वित्तीय एवं विकासात्मक नीति के मुख्य प्रवाह का अभिन्न अंग बनाया जाए।