ग्रेट निकोबार परियोजना: विकास की दौड़ और पारिस्थितिक संतुलन की चुनौती

Rs. 81,000 करोड़ का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की समुद्री-सुरक्षा महत्वाकांक्षाओं, आर्थिक कनेक्टिविटी लक्ष्यों और पर्यावरणीय उत्तरदायित्वों के जटिल अंतर्संबंध को प्रतिबिंबित करता है। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित, यह परियोजना इस द्वीप को एक प्रमुख ट्रांसशिपमेंट और लॉजिस्टिक्स हब में बदलते हुए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की उपस्थिति को बढ़ाने का प्रयास करती है।

रणनीतिक एवं आर्थिक महत्व

  • समुद्री प्रहरी के रूप में इसकी भूमिका: मलक्का जलडमरूमध्य के समीप भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाते हुए यह परियोजना प्रति वर्ष 14.2 मिलियन TEUs (ट्वेंटी-फुट इक्विवेलेंट यूनिट्स) संभालने की क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखती है।
  • रक्षा समन्वय: ग्रीनफील्ड द्वैध‑उपयोग हवाई अड्डे एवं समर्पित ऊर्जा संयंत्र के माध्यम से भारत की क्षेत्रीय निगरानी एवं कमांड क्षमताओं को सुदृढ़ करने का प्रयास किया जा रहा है।

पारिस्थितिक एवं सामाजिक जोखिम

  • जैव विविधता हानि: 130.75 वर्ग किलोमीटर पुराने वन क्षेत्र के डायवर्जन (परिवर्तन) से सुंडालैंड की स्थानिक प्रजातियों के लिए खतरा पैदा हो गया है।
  • जनजातीय संप्रभुता: संवेदनशील ‘शोम्पेन’ एवं ‘निकोबारी’ समुदायों के लिए सहमति प्रक्रिया एवं पुनर्वास उपायों की पर्याप्तता को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं।
  • शमन उपायों की प्रभावशीलता: वैज्ञानिकों द्वारा कोरल ट्रांसलोकेशन एवं दूरस्थ वृक्षारोपण जैसे उपायों की पारिस्थितिक समकक्षता पर प्रश्न उठाए गए हैं।

एकीकृत ढांचा

  • भविष्य के विकासात्मक संतुलन के लिए यह आवश्यक है कि आस-पास के प्राथमिक वनों की रक्षा के लिए बुनियादी ढांचे को सख्ती से सीमित क्षेत्रों के भीतर ही केंद्रित किया जाए।
  • प्रगति को ठोस पारिस्थितिक संकेतकों से जोड़ा जाना चाहिए, जिससे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सीमाएं पार होने की स्थिति में परियोजना को रोका जा सके।

निष्कर्ष

ग्रेट निकोबार में सतत विकास तभी संभव है जब रणनीतिक अवसंरचनात्मक विस्तार को पारिस्थितिक सीमाओं, जनजातीय अधिकारों तथा दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रत्यास्थता के अधीन रखा जाए।