भारत तीव्र गति से स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है, किंतु ‘ऊर्जा सुरक्षा’ सुनिश्चित करना आज भी सबसे बड़ी नीतिगत चुनौतियों में से एक है। सौर एवं पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों का तीव्र विस्तार इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है, लेकिन इनका उत्पादन स्वाभाविक रूप से अनियमित होता है। इस चुनौती की गंभीरता 21 मई, 2026 को तब स्पष्ट हुई, जब भारत में अब तक की सर्वाधिक 270.8 गीगावाट की विद्युत मांग दर्ज की गई। ऐसे में दीर्घावधि ऊर्जा भंडारण (Long-Duration Energy Storage: LDES) केवल हरित ऊर्जा संक्रमण का सहायक साधन नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति के लिए एक नीतिगत अनिवार्यता बनकर उभरा है।
दीर्घावधि ऊर्जा भंडारण का महत्त्व
नीतिगत चुनौतियाँ
भविष्य की राह
भारत की ऊर्जा नीति को उत्पादन-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़ाकर भंडारण-केंद्रित (Storage-led) मॉडल अपनाना होगा। विविध ऊर्जा भंडारण प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहन, दीर्घकालिक नीतिगत समर्थन, बाज़ार सुधार, अनुसंधान एवं स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देकर ही एक सुदृढ़ LDES पारितंत्र विकसित किया जा सकता है। यही भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सशक्त बनाने, नवीकरणीय ऊर्जा के प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करने तथा भविष्य की स्वच्छ एवं विश्वसनीय विद्युत व्यवस्था की आधारशिला सिद्ध होगा।