जलवायु परिवर्तन और हिमालय में बढ़ता आपदा जोखिम
अगस्त 2026 में नेपाल के लांगतांग क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों के ढहने से मलबे से भरी विनाशकारी बाढ़ आई, जिसका प्रभाव लगभग 170 किलोमीटर तक देखा गया। यह घटना संकेत देती है कि हिमालय के हिममंडल (Cryosphere) की स्थिरता कमजोर पड़ रही है। समान भूगर्भीय संरचना और जलवायु संबंधी दबावों का सामना कर रहे भारतीय हिमालयी क्षेत्र (IHR) के लिए यह एक गंभीर चेतावनी है।
वर्तमान परिदृश्य
- उच्च पर्वतीय एशियाई क्षेत्र का तापमान लगभग 0.3°C प्रति दशक की दर से बढ़ रहा है, जो वैश्विक औसत से लगभग दोगुना है। इसमें पश्चिमी हिमालय का तापमान सबसे तेजी से बढ़ रहा है।
- हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में हिम के क्षरण की दर वर्ष 2000 के बाद से दोगुनी हो गई है।
- हिमनदों की बर्फ का तापमान बढ़कर अब लगभग −2°C तक पहुँच गया है, जिससे उसके पिघलने की संभावना बढ़ गई है। वहीं, पिघली हुई बर्फ का पानी हिमनदों के आधार पर घर्षण कम करके उनके खिसकने की गति बढ़ाता है।
- स्थायी रूप से जमी हुई भूमि (Permafrost) का पिघलना भी एक गंभीर चुनौती है। यह पर्वतीय चट्टानों को प्राकृतिक रूप से जोड़े रखने का काम करती है, जिसके कमजोर पड़ने से ढलानों की स्थिरता प्रभावित होती है।
आसन्न खतरे
- बढ़ता तापमान एक के बाद एक उत्पन्न होने वाली आपदाओं (Cascading Hazards) का कारण बन सकता है। इनमें चट्टानी हिमस्खलन, भूस्खलन, हिमनदीय झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ और मलबे का तेज बहाव शामिल हैं। ये घटनाएँ घाटियों में अस्थायी अवरोध पैदा कर सकती हैं, जिनके अचानक टूटने से विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।
- नाजुक पर्वतीय ढलानों पर जलविद्युत परियोजनाओं, सुरंगों और सड़कों का निर्माण आपदाओं के प्रति जोखिम बढ़ाता है, जबकि पर्याप्त आँकड़ों का अभाव आपदा प्रबंधन की तैयारियों को कमजोर करता है।
क्या किया जाना चाहिए?
- चूँकि बर्फ और चट्टानों के ढहने जैसी प्राकृतिक घटनाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, इसलिए प्राथमिकता उनके प्रभाव और संभावित क्षति को कम करने की होनी चाहिए।
- इसके लिए सीमा-पार सहयोग और वास्तविक समय में आँकड़ों का साझा उपयोग आवश्यक है। उपग्रहों एवं ड्रोन से निगरानी, नदियों में सेंसर की स्थापना तथा हिमनदीय झीलों की निरंतर निगरानी और नियंत्रित जल निकासी की व्यवस्था को मजबूत करना होगा।
- बाढ़-प्रभावित क्षेत्रों का निर्धारण पर्वतीय ढलानों की संवेदनशीलता के अनुरूप होना चाहिए। विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों के अनुसार लगभग 2,200 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। वहीं, चिनाब-ब्यास संपर्क सुरंग जैसी पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील परियोजनाओं पर पुनर्विचार आवश्यक है।
- आपदा संबंधी खतरों और जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता का पुनर्मूल्यांकन होने तक ऐसी परियोजनाओं पर अस्थायी रोक (Moratorium) लगाना एक विवेकपूर्ण कदम होगा।
निष्कर्ष
हिमालय दक्षिण एशिया का प्रमुख जलस्रोत होने के साथ-साथ इस पूरे क्षेत्र की साझा प्राकृतिक धरोहर भी है। इसलिए विकास योजनाओं में आपदा जोखिमों को शुरुआत से ही ध्यान में रखना आवश्यक है। वैज्ञानिक आकलन और क्षेत्रीय सहयोग पर आधारित विकास मॉडल ही यह सुनिश्चित कर सकता है कि आर्थिक प्रगति की रफ्तार हिमालय की पारिस्थितिक वहन क्षमता से आगे न निकल जाए।