BRICS और SCO—दोनों की सदस्यता को अक्सर भारत के बढ़ते बहुपक्षीय प्रभाव के प्रमाण के रूप में देखा जाता है। किंतु अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत इन दोनों मंचों के साथ अपने जुड़ाव को अलग-अलग रणनीतिक उद्देश्यों के अनुरूप ढाल सकता है, या फिर उन्हें केवल “ग्लोबल साउथ” की एकजुटता के परस्पर विनिमेय मंचों के रूप में देखता है।
कार्यगत प्रकृति में अंतर
चीन-रूस प्रभाव में असमानता
क्षेत्रवार रणनीतिक स्वायत्तता
भारत का दृष्टिकोण मुद्दा-आधारित बहु-संरेखण को दर्शाता है। वह BRICS से वित्तीय और संस्थागत लाभ प्राप्त करना चाहता है, जबकि SCO का उपयोग क्षेत्रीय स्थिरता, संपर्क और मध्य एशियाई जुड़ाव के लिए करता है, बिना यह अनुमति दिए कि इनमें से कोई मंच उसकी क्वाड या हिन्द-प्रशांत प्रतिबद्धताओं को सीमित करे। इस प्रकार, दोनों सदस्यताओं को वैचारिक रूप से एकीकृत करने के बजाय कार्यगत रूप से अलग रखना ही भारत की रणनीतिक शक्ति है।
निष्कर्ष
भारत की वास्तविक क्षमता BRICS और SCO को एक ही विश्वदृष्टि में समाहित करने में नहीं, बल्कि उनकी अलग-अलग उपयोगिता बनाए रखने में है। यही अलगाव भारत को प्रत्येक मंच से वह लाभ लेने की अनुमति देता है जो दूसरा नहीं दे सकता, और साथ ही किसी एक शक्ति की रणनीतिक संरचना के अधीन होने से बचाता है।