BRICS और SCO में भारत: पृथक मंच, पृथक रणनीतिक उद्देश्य

BRICS और SCO—दोनों की सदस्यता को अक्सर भारत के बढ़ते बहुपक्षीय प्रभाव के प्रमाण के रूप में देखा जाता है। किंतु अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत इन दोनों मंचों के साथ अपने जुड़ाव को अलग-अलग रणनीतिक उद्देश्यों के अनुरूप ढाल सकता है, या फिर उन्हें केवल “ग्लोबल साउथ” की एकजुटता के परस्पर विनिमेय मंचों के रूप में देखता है।

कार्यगत प्रकृति में अंतर

  • BRICS मुख्यतः आर्थिक-वित्तीय सहयोग का मंच है। न्यू डेवलपमेंट बैंक, डी-डॉलराइजेशन पर विमर्श और वैश्विक वित्तीय शासन में सुधार जैसे मुद्दे भारत के उस हित से मेल खाते हैं, जिसके तहत वह ब्रेटन वुड्स संस्थाओं पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना चाहता है।
  • इसके विपरीत, SCO एक यूरेशियाई सुरक्षा और संपर्क मंच है, जिसका प्रमुख फोकस आतंकवाद-रोधी सहयोग, मध्य एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता तथा अफगानिस्तान से जुड़े मुद्दों पर है। ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ भारत के हित वैश्विक व्यवस्था की तुलना में अधिक प्रत्यक्ष और भौगोलिक हैं।

चीन-रूस प्रभाव में असमानता

  • दोनों मंचों पर चीन और रूस का प्रभाव है, किंतु उसका स्वरूप समान नहीं है।
  • BRICS में चीन की केंद्रीयता इस आशंका को जन्म देती है कि मंच ऐसा पश्चिम-विरोधी रुख अपना सकता है, जिससे भारत पूरी तरह सहमत न हो।
  • वहीं SCO में रूस की भूमिका भारत को यूरेशियाई सुरक्षा संरचना में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच एक संतुलनकारी माध्यम उपलब्ध कराती है।
  • यही असमानता भारत को किसी एक गुट में बँधने के बजाय अलग-अलग मंचों से अलग-अलग रणनीतिक लाभ लेने का अवसर देती है।

क्षेत्रवार रणनीतिक स्वायत्तता

भारत का दृष्टिकोण मुद्दा-आधारित बहु-संरेखण को दर्शाता है। वह BRICS से वित्तीय और संस्थागत लाभ प्राप्त करना चाहता है, जबकि SCO का उपयोग क्षेत्रीय स्थिरता, संपर्क और मध्य एशियाई जुड़ाव के लिए करता है, बिना यह अनुमति दिए कि इनमें से कोई मंच उसकी क्वाड या हिन्द-प्रशांत प्रतिबद्धताओं को सीमित करे। इस प्रकार, दोनों सदस्यताओं को वैचारिक रूप से एकीकृत करने के बजाय कार्यगत रूप से अलग रखना ही भारत की रणनीतिक शक्ति है।

निष्कर्ष

भारत की वास्तविक क्षमता BRICS और SCO को एक ही विश्वदृष्टि में समाहित करने में नहीं, बल्कि उनकी अलग-अलग उपयोगिता बनाए रखने में है। यही अलगाव भारत को प्रत्येक मंच से वह लाभ लेने की अनुमति देता है जो दूसरा नहीं दे सकता, और साथ ही किसी एक शक्ति की रणनीतिक संरचना के अधीन होने से बचाता है।