भवन निर्माण क्षेत्र एवं उत्सर्जन: भारत के संधारणीय शहरीकरण की राह में चुनौतियां

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की ‘ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट फॉर बिल्डिंग्स एंड कंस्ट्रक्शन 2025-2026’ एक असहज वास्तविकता को सामने रखती है; इसके अनुसार भवन एवं निर्माण क्षेत्र वैश्विक CO₂ उत्सर्जन का 37% तथा कुल भौतिक संसाधन दोहन का लगभग आधा हिस्सा उत्पन्न करता है, जबकि इसका विस्तार विकार्बनीकरण की तुलना में कहीं अधिक तेज गति से हो रहा है। अभूतपूर्व स्तर पर शहरीकरण कर रहे भारत के लिए यह स्थिति केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विकास से जुड़ी एक गंभीर चुनौती है।

चुनौती का व्यापक परिदृश्य

  • पिछले दशक में वैश्विक स्तर पर ‘फ्लोर स्पेस’ (भवन क्षेत्र) में 20% की वृद्धि हुई, जबकि निर्माण क्षेत्र का उत्सर्जन 6.5% बढ़ा। यह आंशिक सफलता तो है, लेकिन लक्ष्य से कोसों दूर है।
  • हालांकि, पेरिस समझौते के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु आवश्यक अंतराल घटने के बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है।
  • निर्माण गतिविधियों की गति स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण से कहीं अधिक तीव्र है तथा हीटिंग एवं खाना पकाने जैसे क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता बनी हुई है।
  • किसी भी देश के ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (NDC 3.0) में अभी तक निर्माण क्षेत्र के लिए व्यापक और विस्तृत रणनीति शामिल नहीं की गई है।

भारत की स्थिति

  • रिपोर्ट ने स्पष्ट रूप से भारत को ऐसे देश के रूप में रेखांकित किया है, जहां कार्बन-गहन अवसंरचना के स्थायीकरण से बचने हेतु तत्काल हस्तक्षेप आवश्यक है।
  • सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत ने लक्षित प्रोत्साहनों के माध्यम से ‘रूफटॉप सोलर’ का विस्तार किया है। वहीं, तमिलनाडु राज्य पहले से ही सार्वजनिक निर्माण में ‘निम्न-कार्बन’ खरीद को मुख्यधारा में ला रहा है।
  • ये प्रयास प्रारंभिक अवश्य हैं, किंतु महत्वपूर्ण संकेत प्रदान करते हैं।

नीतिगत अनिवार्यता

किफायती आवास व्यवस्था एवं जलवायु कार्रवाई को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। ‘पैसिव डिज़ाइन’, ‘जीरो-इमिशन’ बिल्डिंग कोड और नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण को भारत के शहरी नियोजन के ढांचे में बुनियादी रूप से समाहित करना होगा; इन्हें केवल ‘महत्वाकांक्षी अतिरिक्त विकल्प’ मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।

आज जो इमारतें खड़ी की जा रही हैं, वही 2050 तक भारत के उत्सर्जन का आधार तय करेंगी। इस दिशा में सही निर्णय लेने की उपलब्ध समय-सीमा अत्यंत सीमित है और लगातार संकुचित होती जा रही है।