भारत-नेपाल संबंध: सहयोग की संभावनाएं और संबंधों की जटिलताएं

दक्षिण एशिया में बहुत कम द्विपक्षीय संबंध ऐसे हैं, जो भारत और नेपाल की तरह जितने प्रगाढ़ और ऐतिहासिक हैं, उतने ही संवेदनशील और नाजुक भी। खुली सीमा, साझा सभ्यतागत विरासत तथा निरंतर बढ़ती आर्थिक परस्पर-निर्भरता के बावजूद दोनों देशों के संबंध समय-समय पर क्षेत्रीय विवादों, शक्ति-असंतुलन की धारणाओं और चीन के बढ़ते प्रभाव जैसी चुनौतियों से प्रभावित होते रहे हैं। परिणामस्वरूप, अपार संभावनाओं से परिपूर्ण यह संबंध अक्सर विश्वास और संदेह के बीच झूलता रहता है।

क्षेत्रीय दावों की जटिलता: सीमाओं का कूटनीतिक द्वंद्व

  • कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा का त्रिकोणीय क्षेत्र भारत-नेपाल संबंधों का सबसे संवेदनशील और विवादास्पद मुद्दा बना हुआ है।
  • अगस्त 2025 में भारत और चीन के बीच लिपुलेख व्यापार मार्ग को पुनः प्रारंभ करने पर हुआ द्विपक्षीय समझौता, जिसमें नेपाल से कोई परामर्श नहीं किया गया, एक पुरानी प्रवृत्ति को रेखांकित करता है कि महाशक्तियों के द्विपक्षीय निर्णय अक्सर छोटे देशों की संप्रभुता संबंधी चिंताओं को पीछे छोड़ देते हैं।
  • नेपाल की आपत्तियों पर चीन की सोची-समझी चुप्पी और इसे भारत-नेपाल का आपसी मामला बताना, दोनों बड़ी ताकतों (भारत-चीन) के हितों को तो साध गया, लेकिन इसने नेपाल को हाशिये पर धकेल दिया।

ऊर्जा सहयोग: संबंधों की सबसे बड़ी संभावना

  • इन चुनौतियों के बीच जलविद्युत (Hydropower) क्षेत्र में सहयोग इस रिश्ते को सबसे टिकाऊ और मजबूत आधार प्रदान करता है।
  • नेपाल के पास लगभग 83,000 मेगावाट जलविद्युत क्षमता उपलब्ध है, जिसका अधिकांश भाग अभी भी अप्रयुक्त है। दूसरी ओर, भारत ने वर्ष 2030 तक नेपाल से 5,000 मेगावाट बिजली आयात करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
  • नेपाल की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) सरकार का व्यावहारिक दृष्टिकोण (राजनीतिक शर्तों के बजाय जलविद्युत संसाधनों के आर्थिक दोहन पर बल) दोनों देशों को आर्थिक सहयोग को कूटनीतिक उतार-चढ़ाव से अलग रखने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।

भविष्य की रूपरेखा: संबंधों का पुनर्संतुलन

नेपाल में Gen-Z प्रेरित राजनीतिक परिवर्तन ने ऐसे नेतृत्व को जन्म दिया है, जो किसी भी प्रकार की अधीनता या असमान संबंधों की छवि से संवैधानिक और राजनीतिक रूप से असहज है। ऐसे में 1950 की भारत-नेपाल शांति एवं मैत्री संधि की पुनर्समीक्षा, जो दोनों देशों की संप्रभु समानता को स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित करे, समय की आवश्यकता बन गई है।

यदि यह आवश्यक पुनर्संतुलन नहीं किया जाता, तो परिणाम वही पुराना और जाना-पहचाना होगा: एक ऐसा रिश्ता जो संभावनाओं से तो भरपूर है, लेकिन इतिहास के बोझ और पुरानी आदतों के साये से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पा रहा है।