भारत में वन्यजीव संरक्षण के प्रयास परंपरागत रूप से विभिन्न प्रजातियों और उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा पर केंद्रित रहे हैं। लेकिन दशकों से जारी प्राकृतिक आवासों के विखंडन, पारिस्थितिक क्षरण और वन्यजीवों की घटती आबादी ने प्रकृति की स्वतः पुनर्बहाली की क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल में बक्सा टाइगर रिजर्व में बाघों का पुनर्प्रवेश और प्रोजेक्ट चीता जैसी पहलों ने वन्यजीव संरक्षण से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने रखा है, कि क्या जैव विविधता की बहाली के लिए सक्रिय मानवीय हस्तक्षेप आवश्यक होता जा रहा है, या हमारा अंतिम लक्ष्य ऐसे आत्मनिर्भर पारिस्थितिक तंत्र विकसित करना होना चाहिए जो प्राकृतिक रूप से अपना अस्तित्व बनाए रख सकें?
सक्रिय मानवीय हस्तक्षेप क्यों आवश्यक है?
वन्यजीव संरक्षण में समग्र पारिस्थितिक दृष्टिकोण की आवश्यकता
स्थायी वन्यजीव संरक्षण के लिए संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक
सक्रिय मानवीय हस्तक्षेप की बढ़ती आवश्यकता के बीच इस व्यापक उद्देश्य को नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति पुनः अपनी स्वाभाविक क्षमता के बल पर स्वयं को बनाए रख सके। इसलिए संरक्षण प्रयासों में प्राकृतिक आवासों के बीच संपर्क, वैज्ञानिक प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से पारिस्थितिक तंत्र की पुनर्बहाली और अनुकूलन क्षमता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वन्यजीव संरक्षण स्थायी रूप से मानवीय सहायता पर निर्भर न हो जाए।
अंततः वन्यजीव संरक्षण की सफलता का आकलन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि मानवीय हस्तक्षेप कितना व्यापक है, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि पारिस्थितिक तंत्र न्यूनतम बाहरी सहायता के साथ जैव विविधता को संरक्षित रखने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में कितने सक्षम हैं।