भारत में स्कूली शिक्षा: प्रणालीगत एवं शैक्षणिक चुनौतियां
हाल ही में नीति आयोग द्वारा जारी भारत की स्कूली शिक्षा संबंधी रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि विद्यालयी शिक्षा क्षेत्र अनेक बहुआयामी चुनौतियों का सामना कर रहा है, जो इसे ‘सार्वभौमिक पहुंच’ से ‘उच्च-गुणवत्ता वाले अधिगम परिणामों’ (Learning Outcomes) की दिशा में संक्रमण करने से बाधित करती हैं।
प्रणालीगत चुनौतियां
- विद्यालयी संरचना की खंडित व्यवस्था तथा शैक्षणिक निरंतरता का अभाव बच्चों की शैक्षिक यात्रा में संक्रमण संबंधी बाधाएं उत्पन्न करता है। वर्तमान में केवल लगभग 5% विद्यालय ही कक्षा 1 से 12 तक निरंतर शिक्षा उपलब्ध कराते हैं।
- आधारभूत संरचना संबंधी कमियां अभी भी बनी हुई हैं; लगभग 1.19 लाख विद्यालयों में बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
- ‘समता’ एवं ‘समावेशन’ से संबंधित अंतराल वंचित तथा प्रवासी आबादी की शैक्षणिक पहुंच को प्रभावित करते हैं।
- प्रशासनिक स्तर पर कर्मियों की कमी के कारण शासन व्यवस्था एवं विद्यालय नेतृत्व संबंधी चुनौतियां और अधिक गंभीर हो जाती हैं।
- शिक्षक कार्यबल प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं में रिक्त पदों की अधिकता तथा शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ शामिल है।
- इन सभी कारकों के परिणामस्वरूप निजी शिक्षा प्रणाली पर निर्भरता बढ़ रही है तथा सरकारी विद्यालयों के प्रति जनधारणा में परिवर्तन देखा जा रहा है, जबकि निजी क्षेत्र के परिणाम भी समान रूप से संतोषजनक नहीं हैं।
शैक्षणिक चुनौतियां
- शिक्षण-पद्धति, पाठ्यक्रम तथा अधिगम परिणामों के बीच तालमेल की कमी एक मूलभूत समस्या है, जहां आधारभूत दक्षताओं के विकास के बजाय पाठ्यक्रम पूर्ण करने पर अधिक बल दिया जाता है।
- मूल्यांकन संबंधी आंकड़े दर्शाते हैं कि प्रारंभिक कक्षाओं में विद्यार्थियों की निष्कर्ष निकालने और व्याख्या करने की क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ज्ञान की पहचान और उसके व्यावहारिक उपयोग के बीच गंभीर अंतर मौजूद है।
- इसके अतिरिक्त, छात्र कल्याण, भावनात्मक विकास और समग्र व्यक्तित्व निर्माण से संबंधित कमियां भी चिंता का विषय हैं। प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ECCE) तथा व्यावसायिक शिक्षा से जुड़ी चुनौतियां विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को और सीमित करती हैं।
प्रमुख अनिवार्यताएं
इन आंतरिक अवरोधों को दूर करने हेतु संरचनात्मक तथा शैक्षणिक स्तर पर समन्वित सुधार अत्यंत आवश्यक हैं, ताकि देश की दीर्घकालिक मानव पूंजी निर्माण एवं विकास संबंधी आकांक्षाओं को साकार किया जा सके।