भारत में पवन ऊर्जा: नीतिगत ढांचा, जमीनी चुनौतियां और भविष्य की राह

स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते वैश्विक संक्रमण में भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा को अपनी जलवायु रणनीति का प्रमुख आधार बनाया है। इस संदर्भ में पवन ऊर्जा एक ऐसी क्षमता का प्रतिनिधित्व करती है, जो न केवल ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकती है, बल्कि भारत के दीर्घकालिक नेट-ज़ीरो लक्ष्यों की प्राप्ति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि, अपार संभावनाओं के बावजूद इसकी प्रगति भूमि, अवसंरचना, वित्तपोषण और नीतिगत चुनौतियों से प्रभावित रही है।

क्षमता और वर्तमान स्थिति

  • अप्रैल 2026 तक भारत में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता 56.1 गीगावाट से अधिक है, जबकि लगभग 28 गीगावाट क्षमता की परियोजनाएं क्रियान्वयनाधीन हैं।
  • पवन ऊर्जा क्षमता के मामले में भारत विश्व में चौथे स्थान पर है।
  • स्थलीय (Onshore) पवन संसाधन मुख्यतः तमिलनाडु, गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक में केंद्रित हैं।
  • भारत ने वर्ष 2030 तक 100 गीगावाट तथा 2036 तक 156 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
  • 150 मीटर की हब ऊंचाई (Hub Height) पर भारत की अनुमानित पवन ऊर्जा क्षमता लगभग 1164 GW आंकी गई है।
  • यह क्षमता वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

निरंतर बनी हुई चुनौतियां

  • भूमि अधिग्रहण से संबंधित बाधाएं।
  • विद्युत ग्रिड अवसंरचना का विखंडित एवं अपर्याप्त स्वरूप।
  • राज्य वितरण कंपनियों (DISCOMs) द्वारा पवन ऊर्जा उत्पादन में कटौती।
  • अपतटीय (Offshore) परियोजनाओं के लिए वित्तपोषण की कठिनाइयां।
  • उच्च उत्पादन लागत तथा अपर्याप्त बंदरगाह एवं पोत अवसंरचना।

पर्यावरणीय आयाम

  • पवन ऊर्जा कोयला आधारित विद्युत उत्पादन पर निर्भरता कम कर कार्बन उत्सर्जन घटाने में सहायक है।
  • हालांकि, पवन ऊर्जा गलियारों के निकट पक्षियों की मृत्यु, आवास विखंडन तथा जैव-विविधता पर ध्वनि प्रदूषण जैसे प्रभाव भी सामने आते हैं।
  • इसलिए प्रत्येक परियोजना के लिए क्षेत्र-विशिष्ट पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) आवश्यक है।

नीतिगत ढांचा

  • राष्ट्रीय पवन-सौर हाइब्रिड नीति (मई 2018) पवन एवं सौर ऊर्जा के संयुक्त विकास को प्रोत्साहित करती है।
  • नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) द्वारा अपतटीय पवन ऊर्जा निविदाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • भारत ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है।
  • हालांकि, टैरिफ पुनर्निर्धारण संबंधी विवाद तथा नवीकरणीय ऊर्जा क्रय दायित्व (RPO) के कमजोर अनुपालन से नीतियों की प्रभावशीलता प्रभावित होती है।

भविष्य की राह

भारत में पवन ऊर्जा क्षेत्र की वास्तविक क्षमता का दोहन करने के लिए आधुनिक एवं सुदृढ़ ग्रिड प्रणाली, अपतटीय परियोजनाओं हेतु व्यवहार्य वित्तीय ढांचा तथा भूमि एवं ट्रांसमिशन अवसंरचना के विकास में केंद्र-राज्य समन्वय को मजबूत करना आवश्यक है। प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता को संस्थागत दक्षता और प्रभावी क्रियान्वयन से जोड़कर ही पवन ऊर्जा को भारत की ऊर्जा व्यवस्था का प्रमुख स्तंभ बनाया जा सकता है।