भारत में अनुसंधान एवं विकास: संसाधनों की कमी या संरचनात्मक कमजोरियाँ?

वैज्ञानिक शोध-पत्रों के प्रकाशन और नवाचार संबंधी वैश्विक रैंकिंग में भारत की प्रगति के बावजूद अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों को बड़े पैमाने पर विकसित करने की उसकी क्षमता सीमित बनी हुई है। यह विरोधाभास केवल अपर्याप्त वित्तीय निवेश का परिणाम नहीं है, बल्कि ऐसी अनुसंधान एवं नवाचार व्यवस्था की कमजोरियों को भी दर्शाता है, जो अर्जित ज्ञान को आर्थिक और रणनीतिक लाभ में प्रभावी ढंग से परिवर्तित नहीं कर पा रही है।

वित्तीय निवेश में कमी के साथ संरचनात्मक कमजोरियाँ

  • वर्ष 2023-24 में भारत का अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय सकल घरेलू उत्पाद के 0.84% तक पहुँच गया, लेकिन यह अब भी प्रमुख प्रौद्योगिकी-संपन्न अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी कम है।
  • यद्यपि व्यापक परिभाषा के अंतर्गत निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी कुल अनुसंधान व्यय में 51.8% हो गई है, फिर भी अनुसंधान गतिविधियाँ कुछ चुनिंदा संस्थानों और क्षेत्रों तक सीमित हैं।
  • अल्पकालिक निवेश दृष्टिकोण अनिश्चित परिणामों वाले ऐसे मौलिक अनुसंधानों को हतोत्साहित करता है, जिनके परिणाम सामने आने में लंबा समय लगता है।

संस्थागत एवं मानव संसाधन संबंधी कमियाँ

  • राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास व्यय में विश्वविद्यालयों की हिस्सेदारी मात्र 12.6% है, जो शिक्षण और अनुसंधान के बीच कमजोर समन्वय को दर्शाती है।
  • प्रयोगशाला सुविधाओं में असमानता, शोधकर्ताओं के लिए करियर के शुरुआती चरण में अनिश्चित अवसर और विभिन्न विषयों के बीच सीमित सहयोग प्रतिभाओं के विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • शोधकर्ताओं को अनुदान मिलने में देरी, खरीद संबंधी कठोर नियमों और अनुपालन के बोझ जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। नीति आयोग द्वारा चिह्नित इन समस्याओं के कारण शोधकर्ताओं का काफी समय वैज्ञानिक अनुसंधान के बजाय प्रशासनिक कार्यों में खर्च होता है।

अनुसंधान और नवाचार के बीच कमजोर जुड़ाव

  • केवल प्रकाशित शोध-पत्रों और पेटेंटों की संख्या किसी देश की तकनीकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का पर्याप्त मापदंड नहीं हो सकती।
  • विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बीच कमजोर साझेदारी, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की सीमित क्षमता तथा दीर्घकालिक एवं जोखिम-सहनशील पूँजी (Patient Capital) की कमी प्रयोगशालाओं में होने वाली खोजों को व्यावसायिक रूप से उपयोगी उत्पादों में बदलने की प्रक्रिया में बाधा डालती है।
  • उन्नत उपकरणों और महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के लिए आयात पर निर्भरता घरेलू नवाचार व्यवस्था की कमजोरियों को और उजागर करती है।
  • अनुसंधान क्षमताओं का कुछ क्षेत्रों में भौगोलिक संकेंद्रण इन समस्याओं को और गंभीर बनाता है।

वित्तीय आवंटन से आगे क्षमता निर्माण पर जोर

  • अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) और एक लाख करोड़ रुपये की अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (RDI) पहल महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करती हैं। हालाँकि, इनकी प्रभावशीलता पारदर्शी एवं समयबद्ध वित्तपोषण तथा अनुसंधान से जुड़े जोखिमों को वास्तविक रूप से साझा करने की व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
  • भारत को सशक्त अनुसंधान विश्वविद्यालयों, शोधकर्ताओं के नेतृत्व वाली परियोजनाओं के लिए प्रतिस्पर्धात्मक अनुदान, विशिष्ट लक्ष्यों पर केंद्रित सार्वजनिक खरीद, उद्योगों की व्यापक भागीदारी तथा अनुसंधान की गुणवत्ता और सामाजिक परिणामों पर आधारित विश्वसनीय मूल्यांकन व्यवस्था की आवश्यकता है।
अंततः तकनीकी आत्मनिर्भरता केवल अनुसंधान व्यय बढ़ाने से हासिल नहीं होगी। इसके लिए ऐसी अनुसंधान एवं नवाचार व्यवस्था विकसित करनी होगी, जो वैज्ञानिक जिज्ञासा को प्रोत्साहित करे, असफलताओं को सीखने की प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करे और वैज्ञानिक खोजों को व्यावहारिक उपयोग से जोड़े।