भारत की स्वदेशी फसल किस्में किस प्रकार पोषण सुरक्षा और जलवायु सहनशीलता की आधारशिला बन सकती हैं?

ऐसे समय में जब औद्योगिक कृषि वैश्विक खाद्य प्रणालियों को एकरूपता की ओर धकेल रही है, भारत की स्वदेशी फसल किस्में, जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप सदियों की कृषि परंपराओं और किसानों के अनुभवजन्य ज्ञान से विकसित हुई हैं, पोषण की कमी और जलवायु सुभेद्यता जैसी दो गंभीर चुनौतियों के विरुद्ध एक अमूल्य, किंतु अभी तक पर्याप्त रूप से अप्रयुक्त, राष्ट्रीय धरोहर के रूप में सामने आती हैं।

पोषण सुरक्षा की सुदृढ़ आधारशिला

  • धान, दलहन और मोटे अनाजों (मिलेट्स) की पारंपरिक किस्मों में लौह, कैल्शियम, प्रोटीन तथा डाइटरी फाइबर की मात्रा उनकी व्यावसायिक किस्मों की तुलना में कहीं अधिक पाई जाती है।
  • ये फसलें देश के 20 करोड़ से अधिक लोगों को प्रभावित करने वाली ‘अदृश्य भूख’ (Hidden Hunger) अर्थात् सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी की समस्या के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
  • विशेष रूप से, यदि इन्हें पीएम पोषण योजना तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी योजनाओं में सम्मिलित किया जाए, तो चावल-गेहूं पर आधारित मौजूदा खाद्य निर्भरता में विविधता लाई जा सकती है तथा पोषणीय सहनशीलता को नीतिगत ढांचे का अभिन्न अंग बनाया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध प्राकृतिक कवच

  • स्वदेशी फसल किस्में सूखा, लवणीयता, बाढ़ और कीट-प्रकोप जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच किसानों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी किए गए चयन और संरक्षण की जीवंत विरासत हैं।
  • रासायनिक उर्वरकों और अन्य बाह्य इनपुट्स पर उनकी अपेक्षाकृत कम निर्भरता न केवल मृदा की जैव-विविधता को संरक्षित करती है, बल्कि कृषि उत्पादन को जोखिमों से भी अधिक सुरक्षित बनाती है।
  • गहन कृषि निवेश पर आधारित उच्च उपज वाली किस्मों के विपरीत, ये स्थानीय किस्में भविष्य के जलवायु आघातों के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण आनुवंशिक सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं।

स्वदेशी फसल प्रणालियों का पुनरोद्धार: एक दूरदर्शी नीतिगत प्राथमिकता

यदि बीजों के संरक्षण और उन पर किसानों के अधिकार को सुदृढ़ करने वाले संस्थागत ढांचे, सामुदायिक बीज बैंक तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा नीति में इनके प्रभावी समावेशन की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इनके भीतर निहित बहुमूल्य आनुवंशिक विविधता के अपरिवर्तनीय क्षरण का खतरा गंभीर रूप से बढ़ सकता है।

अतः स्वदेशी फसल प्रणालियों का पुनरोद्धार केवल कृषि विरासत के संरक्षण का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक दूरदर्शी रणनीतिक आवश्यकता है। पोषण-सुरक्षित, पर्यावरण-संतुलित और जलवायु-सहनशील भारत के निर्माण के लिए इन फसलों को कृषि एवं खाद्य नीति के केंद्र में स्थापित करना अनिवार्य है।