भारत का सौर ऊर्जा विस्तार अब ऐसे चरण में प्रवेश कर रहा है, जहाँ भूमि की उपलब्धता भी उत्पादन क्षमता जितनी ही महत्वपूर्ण होती जा रही है। बड़ी भू-आधारित सौर परियोजनाओं के लिए व्यापक भूमि की आवश्यकता होती है, जिससे कृषि, बस्तियों और अन्य अवसंरचनात्मक जरूरतों के साथ प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो सकती है। इसलिए यदि भारत को सीमित भूमि संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाले बिना नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ानी है, तो भूमि-दक्ष सौर समाधानों का महत्व लगातार बढ़ेगा।
पारंपरिक सौर विस्तार से भूमि-दक्ष समाधान की ओर
भारत की सौर ऊर्जा रणनीति को बड़े भू-आधारित संयंत्रों तक सीमित रहने के बजाय उन स्थानों और परिसंपत्तियों का अधिक उपयोग करना होगा, जो पहले से अन्य आर्थिक या सार्वजनिक उद्देश्यों की पूर्ति कर रहे हैं। छतें/रूफटॉप, जलाशय, नहर नेटवर्क और अन्य बहुउद्देशीय अवसंरचनाएँ अतिरिक्त भूमि पर तुलनीय दबाव डाले बिना सौर ऊर्जा उत्पादन का आधार बन सकती हैं।
तकनीकी क्षमता से व्यापक क्रियान्वयन तक
भारत नहर-आधारित सौर ऊर्जा प्रणाली को अपनाने वाले शुरुआती देशों में रहा है, लेकिन ऊँची संरचनाओं, रखरखाव की कठिनाइयों और नहरों की अनियमित ज्यामिति के कारण परियोजना लागत बढ़ती है और इसका विस्तार सीमित रहा है। इसलिए केवल वित्तीय सहायता पर्याप्त नहीं होगी।
अधिक प्रभावी रणनीति में उपयुक्त स्थलों की प्राथमिकता, मानकीकृत डिजाइन, वायबिलिटी गैप फंडिंग, कम लागत वाला वित्तयन, ग्रिड की निकटता तथा ऊर्जा और सिंचाई एजेंसियों के बीच समन्वय शामिल होना चाहिए।
भूमि-दक्ष सौर रणनीति की आवश्यकता
भारत का सौर ऊर्जा संक्रमण केवल अधिक भूमि अधिग्रहण पर निर्भर नहीं होना चाहिए। अधिक भूमि-दक्ष विकास मॉडल भूमि-संघर्ष को कम कर सकता है, संसाधनों पर दबाव घटा सकता है और नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार को सामाजिक तथा पर्यावरणीय दृष्टि से अधिक धारणीय बना सकता है।