भारत की खनिज संपदा और राजकोषीय संघवाद की सीमाएं

भारत की खनिज संपदा भौगोलिक रूप से कुछ चुनिंदा राज्यों में केंद्रित है, लेकिन उससे होने वाले लाभ पूरे देश में वितरित होते हैं। इसके विपरीत, खनन की लागत - विस्थापन, पारिस्थितिक क्षरण, स्थानीय अवसंरचना पर बढ़ता दबाव तथा सीमित प्राकृतिक संसाधनों का अपरिवर्तनीय दोहन, मुख्यतः उन्हीं क्षेत्रों को वहन करनी पड़ती है जहाँ खनन होता है। वर्ष 2026 में खनिज विनियमन ढाँचे में किए गए संशोधन, विशेषकर राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले उपकरों पर प्रतिबंध, इस असंतुलन को सीधे राजकोषीय संघवाद के प्रश्न से जोड़ देते हैं।

आर्थिक तर्क और उसकी सीमाएँ

  • पूर्वानुमेयता एक वैध नीतिगत उद्देश्य है। दीर्घकालिक और पूँजी-गहन परियोजनाओं के लिए स्थिर राजकोषीय वातावरण आवश्यक होता है, और अनियंत्रित उपकर निवेश को हतोत्साहित कर सकते हैं।
  • लेकिन यह तर्क कि मौजूदा रॉयल्टी और नीलामी प्रीमियम जारी रहेंगे, मूल प्रश्न का समाधान नहीं करता। प्रतिबंध का प्रभाव भविष्य पर पड़ता है; अर्थात यह राज्यों की आज की आय नहीं, बल्कि भविष्य में अतिरिक्त राजस्व अर्जित करने की उनकी क्षमता को सीमित करता है।
  • जिन राज्यों में खनन से प्राप्त आय गैर-कर राजस्व का महत्वपूर्ण आधार है और जहाँ खनन-प्रभावित जिलों पर सार्वजनिक व्यय अपेक्षाकृत अधिक होता है, वहाँ यह प्रतिबंध उनके स्वाभाविक आर्थिक लाभ को सीमित कर सकता है।

संवैधानिक प्रश्न

  • राज्य सूची राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर तथा भूमि और भवनों पर कर लगाने की अलग-अलग शक्तियाँ देती है।
  • संसद खनिज विकास संबंधी कानून के माध्यम से खनिज अधिकारों पर कराधान को सीमित कर सकती है, लेकिन भूमि एवं भवन पर कराधान राज्यों के विशिष्ट क्षेत्राधिकार में आता है।
  • यदि प्रतिबंध को खनिज-समृद्ध भूमि तक भी विस्तारित किया जाता है, तो यह इस संवैधानिक सीमा से आगे जाने का प्रश्न उठाता है और राज्यों की कराधान क्षमता को मान्यता देने वाले हालिया 9-न्यायाधीशीय निर्णय के प्रभाव को कम कर सकता है।

जिम्मेदारी बिना वित्तीय क्षमता के

जब संवैधानिक जिम्मेदारियाँ पर्याप्त वित्तीय क्षमता से अलग हो जाती हैं, तो संघवाद कमजोर पड़ता है। कराधान में एकरूपता साधन हो सकती है, अंतिम लक्ष्य नहीं। इसके नाम पर राज्यों की नीतिगत और राजस्व-संबंधी स्वतंत्रता को अत्यधिक सीमित नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

इस बहस को केवल निवेश बनाम कराधान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। राज्यों की भूमि के नीचे मौजूद खनिज राष्ट्रीय विकास में योगदान करते हैं, लेकिन उनके दोहन की सामाजिक और पर्यावरणीय लागत स्थानीय समुदायों को उठानी पड़ती है। इसलिए एक टिकाऊ व्यवस्था वही होगी जो निवेशक निश्चितता और राज्यों के प्राकृतिक संसाधनों पर उनके वैध राजकोषीय हितों के बीच संतुलन स्थापित करे।