भारत की जल शासन संबंधी अनिवार्यताएं
प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में निरंतर गिरावट, तीव्र नगरीकरण तथा जलवायु परिवर्तनजन्य अनिश्चितताओं के कारण भारत की जल शासन व्यवस्था एक संरचनात्मक संक्रमण के दौर से गुजर रही है। पारंपरिक आपूर्ति-केंद्रित दृष्टिकोण अब लगातार अपर्याप्त सिद्ध हो रहा है। ऐसी स्थिति में समेकित तथा मांग-आधारित जल प्रबंधन की ओर संक्रमण आवश्यक हो गया है।
इसी परिप्रेक्ष्य में भारत की प्रमुख जल शासन संबंधी अनिवार्यताएं निम्नलिखित हैं:
अपशिष्ट जल का पुनः उपयोग एवं चक्रीय जल अर्थव्यवस्था
- अपशिष्ट जल को केवल निस्तारण योग्य बोझ के रूप में नहीं, बल्कि एक आर्थिक संसाधन के रूप में देखना सतत जल शासन की केंद्रीय आवश्यकता है।
- ग्रेवाटर (Greywater) रीसाइक्लिंग, विकेंद्रीकृत उपचार प्रणालियों तथा औद्योगिक जल पुनः उपयोग का विस्तार मीठे जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव को कम कर सकता है।
- ऐसे उपाय चक्रीय जल अर्थव्यवस्था (Circular Water Economy) को प्रोत्साहित करते हैं, शहरी जल प्रत्यास्थता (Urban Water Resilience) को सुदृढ़ बनाते हैं तथा भूजल दोहन को बढ़ाए बिना सतत औद्योगीकरण को समर्थन प्रदान करते हैं।
सूक्ष्म सिंचाई एवं कृषि सततता
- भारत में कुल मीठे जल उपभोग का लगभग 80% भाग कृषि क्षेत्र द्वारा उपयोग किया जाता है; अतः सिंचाई दक्षता में सुधार अत्यंत आवश्यक है।
- सूक्ष्म-सिंचाई (माइक्रो-इरिगेशन) प्रौद्योगिकियों, फसल विविधीकरण तथा कृषि-जलवायु अनुरूप फसल प्रणाली को व्यापक रूप से अपनाने से जल-गहन कृषि पर निर्भरता कम की जा सकती है।
- इससे बढ़ते जलवायवीय दबाव के बीच कृषि उत्पादकता में सुधार होगा तथा जलभृतों (Aquifers) की दीर्घकालिक धारणीयता भी सुनिश्चित की जा सकेगी।
प्रौद्योगिकी-संचालित जल शासन
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रिमोट सेंसिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) आधारित निगरानी तथा जलभृत मानचित्रण (Aquifer Mapping) का एकीकरण साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण को सशक्त बना सकता है।
- इससे वास्तविक समय आधारित आकलन तथा पूर्वानुमान-आधारित जल प्रबंधन संभव होगा, जो वर्तमान खंडित एवं प्रतिक्रियात्मक जल शासन व्यवस्था का प्रभावी विकल्प प्रस्तुत करता है।
निष्कर्ष
भारत की दीर्घकालिक जल सुरक्षा एक ऐसी समेकित जल संसाधन प्रबंधन (IWRM) व्यवस्था पर निर्भर करेगी, जिसमें प्रौद्योगिकीय नवाचार, संस्थागत समन्वय तथा समुदाय-आधारित संरक्षण को एकीकृत किया जाए, ताकि सतत एवं जलवायु-प्रत्यास्थ जल शासन सुनिश्चित किया जा सके।