भारत की जैव-अर्थव्यवस्था: वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ते कदम
16 जुलाई, 2026 को नीति आयोग द्वारा जारी ‘2035 तक भारत को अग्रणी जैव-अर्थव्यवस्था महाशक्ति बनाने की रूपरेखा’ (Roadmap for Building India as a Leading BioEconomy Powerhouse by 2035) के अनुसार, भारत आज उस निर्णायक मोड़ पर खड़ा है जिसे अनेक विशेषज्ञ ‘जैविक शताब्दी’ (Biological Century) की शुरुआत मानते हैं। जैव प्रौद्योगिकी चिकित्सा, कृषि और विनिर्माण क्षेत्रों को नई दिशा देने जा रही है। ऐसे में प्रश्न यह नहीं है कि भारत इस परिवर्तन का हिस्सा बनेगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत इसका नेतृत्व कर पाएगा?
विकास की कहानी से रणनीतिक महत्वाकांक्षा तक
- भारत की जैव-अर्थव्यवस्था पिछले एक दशक में 16 गुना बढ़कर 2014 के 10 अरब डॉलर से 2025 में 195.3 अरब डॉलर तक पहुँच गई है और अब यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 4.8% योगदान देती है।
- यह वृद्धि केवल संभावनाओं पर आधारित नहीं है, बल्कि कोविड-19 महामारी के दौरान वैक्सीन निर्माण में भारत की अग्रणी भूमिका, 10,000 से अधिक बायोटेक स्टार्टअप तथा विश्वसनीय जैव-विनिर्माण क्षमता जैसी उपलब्धियों पर आधारित है।
- इस रोडमैप में केवल क्रमिक प्रगति नहीं, बल्कि मिशन मोड में कार्य करते हुए 2035 तक जैव-अर्थव्यवस्था को 691 अरब डॉलर तथा 2047 तक 2.6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचाने और 3 करोड़ से अधिक उच्च-मूल्य रोजगार सृजित करने का लक्ष्य रखा गया है।
समन्वित विकास की रूपरेखा
- इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य का आधार BioE3 नीति है, जिसमें अर्थव्यवस्था (Economy), पर्यावरण (Environment) और रोजगार (Employment) को विकास के तीन प्रमुख स्तंभ बनाया गया है।
- रणनीति के अंतर्गत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), संगणनात्मक जीवविज्ञान (Computational Biology) तथा रोबोटिक्स को पारंपरिक जैविक अनुसंधान के साथ जोड़कर जीन थेरेपी, जलवायु-अनुकूल कृषि, सिंथेटिक बायोलॉजी तथा महामारी तैयारी जैसे क्षेत्रों में राष्ट्रीय जैव मिशनों (National BioMissions) के माध्यम से समन्वित विकास का लक्ष्य रखा गया है।
संस्थागत एवं वित्तीय आधार
- रोडमैप में अंतर-मंत्रालयी समन्वित शासन व्यवस्था, राष्ट्रीय जैव-डेटा परिषद (National Bio-Data Council) तथा अनुसंधान और व्यावसायिक उत्पादन के बीच मौजूद ‘वैली ऑफ डेथ’ की चुनौती को दूर करने के लिए 50,000 करोड़ रुपये के जैव-विकास कोष के गठन की अनुशंसा की गई है।
निष्कर्ष
अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन जैसे वैश्विक प्रतिस्पर्धी पहले ही जैव-अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में निर्णायक कदम उठा चुके हैं। भारत के पास
जैविक युग का नेतृत्व करने का अवसर अभी भी उपलब्ध है, किंतु यह अवसर तेजी से सीमित होता जा रहा है।