भारत की हिन्द-प्रशांत रणनीति: बदलते समुद्री सामरिक परिदृश्य में राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा

हिन्द-प्रशांत (Indo-Pacific) 21वीं सदी की भू-राजनीति का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है, जहाँ सामरिक प्रतिस्पर्धा, समुद्री सुरक्षा तथा आर्थिक संपर्क वैश्विक शक्ति-संतुलन को निरंतर प्रभावित कर रहे हैं। भारत के लिए यह विशाल समुद्री क्षेत्र केवल एक भू-राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक सामरिक आवश्यकता है, क्योंकि उसका व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा तथा क्षेत्रीय प्रभाव हिन्द महासागर और उससे जुड़े समुद्री क्षेत्रों की स्थिरता पर निर्भर है। इसी कारण भारत की हिन्द-प्रशांत रणनीति का उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए एक स्वतंत्र, मुक्त, समावेशी एवं नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था को बढ़ावा देना है।

हिन्द-प्रशांत का सामरिक महत्त्व

  • भारत के कुल बाह्य व्यापार का लगभग आधा तथा ऊर्जा आयात का एक बड़ा भाग हिन्द-प्रशांत क्षेत्र से होकर गुजरता है। इसलिए समुद्री संचार मार्गों (SLOCs) की सुरक्षा आर्थिक स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है।
  • प्रमुख शक्तियों, विशेषकर चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति, ने इस क्षेत्र के सामरिक महत्त्व को और बढ़ा दिया है।
  • सागर, महासागर, हिन्द-प्रशांत महासागर पहल (IPOI) तथा आसियान एवं क्वाड के साथ भारत की गहन भागीदारी क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोगात्मक सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

नियम-आधारित एवं समावेशी समुद्री व्यवस्था की दिशा में

  • भारत का दृष्टिकोण नौवहन की स्वतंत्रता, विवादों के शांतिपूर्ण समाधान, अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान तथा समुद्री क्षेत्र जागरूकता को सुदृढ़ करने पर आधारित है।
  • साथ ही, ब्लू इकोनॉमी, आपदा-प्रतिरोधक क्षमता, सतत संपर्क तथा क्षमता निर्माण पर बढ़ता जोर क्षेत्रीय साझेदारियों को मजबूत करता है और एक उत्तरदायी समुद्री भागीदार (Responsible Maritime Stakeholder) के रूप में भारत की भूमिका को सुदृढ़ बनाता है।

निष्कर्ष

भारत की हिन्द-प्रशांत रणनीति सुरक्षा, आर्थिक हितों तथा कूटनीतिक प्राथमिकताओं के समन्वित दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती है। अपने समुद्री हितों की रक्षा करते हुए एक मुक्त, समावेशी और नियम-आधारित क्षेत्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देकर भारत बदलती वैश्विक समुद्री व्यवस्था में एक महत्त्वपूर्ण स्थिरकारी शक्ति (Stabilising Power) के रूप में निरंतर उभर रहा है।