भारत में डिजिटल परिवर्तन की गति कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा सेंटर, दूरसंचार नेटवर्क और विस्तृत होते इलेक्ट्रॉनिक्स पारितंत्र के माध्यम से तेजी से बढ़ रही है। ये विकास उत्पादकता, कनेक्टिविटी और तकनीकी क्षमता को मजबूत कर रहे हैं। किंतु डिजिटल विकास संसाधनों से मुक्त नहीं है। इसके लिए बिजली, जल, भूमि, शीतलन अवसंरचना, पारेषण नेटवर्क और सामग्री आपूर्ति शृंखलाओं की आवश्यकता होती है। ऐसे में भारत की डिजिटल आकांक्षाओं के विस्तार के साथ यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि तकनीकी प्रगति ऊर्जा, जल और पर्यावरण पर मौजूदा दबाव को और न बढ़ाए।
डिजिटलीकरण की छिपी संसाधन लागत
डेटा सेंटर: एक महत्त्वपूर्ण परीक्षण
भारत में डेटा सेंटर अवसंरचना का विस्तार इस चुनौती को स्पष्ट रूप से सामने लाता है। इन इकाइयों को निर्बाध बिजली, पर्याप्त शीतलन और सावधानीपूर्ण स्थान-निर्धारण की आवश्यकता होती है, जबकि इनसे निकलने वाली अतिरिक्त ऊष्मा स्थानीय तापीय दबाव को बढ़ा सकती है। वर्तमान नीतिगत प्रोत्साहन प्रायः निवेश आकर्षित करने पर केंद्रित हैं, जबकि धारणीयता संबंधी मानक अभी भी असमान हैं।
संसाधन-संवेदी डिजिटल विकास की आवश्यकता
भारत को अपनी डिजिटल नीति में संसाधन दक्षता को समाहित करना होगा। इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती हिस्सेदारी, जल-उपयोग मानक, उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग, दक्ष शीतलन तकनीक, चक्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स, बेहतर ग्रिड नियोजन तथा स्थान-विशिष्ट पर्यावरणीय आकलन आवश्यक हैं। भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक सफलता केवल उसकी वृद्धि की गति पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगी कि वह अपने विकास को संभव बनाने वाले संसाधनों का कितनी दक्षता और धारणीयता के साथ उपयोग करती है।