भारत के लिए एकीकृत राष्ट्रीय ऊर्जा रूपरेखा की आवश्यकता

वर्तमान समय में भारत का ऊर्जा परिदृश्य कोयला, नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन जैसे विविध स्रोतों पर आधारित है। किंतु इन क्षेत्रों का संचालन अलग-अलग मंत्रालयों तथा बिखरे हुए नियामकीय ढांचों के अधीन होने के कारण नीतिगत समन्वय का अभाव बना रहता है। परिणामस्वरूप ऊर्जा सुरक्षा, वहनीयता और धारणीयता जैसे राष्ट्रीय उद्देश्यों को एक साथ प्राप्त करना कठिन हो जाता है।

संस्थागत विखंडन: एक संरचनात्मक बाधा

  • विद्युत, पेट्रोलियम, नवीकरणीय ऊर्जा तथा परमाणु ऊर्जा का पृथक-पृथक प्रशासन नीति-निर्माण को खंडित बना देता है, जिससे ग्रिड आधुनिकीकरण, ऊर्जा भंडारण तथा विभिन्न क्षेत्रों के विद्युतीकरण जैसी समेकित परियोजनाओं में विलंब होता है।
  • विभिन्न ऊर्जा क्षेत्रों में मूल्य निर्धारण और निवेश प्रोत्साहनों की अलग-अलग व्यवस्थाएं संसाधनों के दक्ष एवं संतुलित आवंटन को भी प्रभावित करती हैं।

विविध ऊर्जा संसाधनों का राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से समन्वय

  • एकीकृत ऊर्जा ढांचा प्रौद्योगिकी-तटस्थ (Technology-Neutral) योजना निर्माण को प्रोत्साहित करेगा, जिससे कोयला, प्राकृतिक गैस, सौर, पवन और परमाणु ऊर्जा का मूल्यांकन मंत्रालय-विशिष्ट प्राथमिकताओं के बजाय लागत, उत्सर्जन और विश्वसनीयता जैसे समान मानकों पर किया जा सकेगा।
  • यह ग्रिड प्रबंधन को भी अधिक समन्वित बनाएगा, जिससे ऊर्जा भंडारण और पारेषण अवसंरचना की बेहतर योजना के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा को अधिक प्रभावी ढंग से ग्रिड में सम्मिलित किया जा सकेगा।

समन्वय को सुदृढ़ बनाना

  • ऊर्जा समवर्ती सूची का विषय होने के कारण केंद्र और राज्यों की नीतियों में बेहतर सामंजस्य आवश्यक है।
  • साथ ही, विद्युत, तेल और गैस क्षेत्रों के नियामकों के बीच समन्वय स्थापित कर अधिकार-क्षेत्रों के अनावश्यक अतिव्यापन को कम करना भी महत्वपूर्ण है।

वैश्विक और सामरिक संदर्भ

  • ऐसे समय में जब विश्व के अनेक देश नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में अग्रसर हैं तथा भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला रहे हैं, भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं और आत्मनिर्भर भारत की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए क्षेत्र-विशिष्ट प्रतिक्रियात्मक उपायों के बजाय एक समन्वित, दूरदर्शी और दीर्घकालिक ऊर्जा नीति की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

संस्थागत अभिसरण, प्रभावी समन्वय और दीर्घकालिक रणनीतिक योजना पर आधारित एकीकृत राष्ट्रीय ऊर्जा ढांचा भारत की विविध ऊर्जा संपदाओं को राष्ट्रीय शक्ति में परिवर्तित कर सकता है। ऐसा ढांचा ऊर्जा क्षेत्र को अधिक लचीला, समावेशी और सतत बनाते हुए देश की ऊर्जा सुरक्षा तथा भविष्य की विकास आवश्यकताओं को सुदृढ़ आधार प्रदान करेगा।