भारत का व्यापार परिदृश्य: वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता की चुनौतियाँ
भारत का विदेश व्यापार परिदृश्य इस समय परस्पर विरोधी परिस्थितियों के बीच नए स्वरूप में उभर रहा है। एक ओर भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता (FTA) लागू हो चुका है, वहीं दूसरी ओर संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.) के साथ व्यापारिक संबंध लगातार बदलते तर्कों (पारस्परिक टैरिफ, रूस से कच्चे तेल की खरीद तथा अब बंधुआ श्रम और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के आरोपों) की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। दूसरी ओर, किसी औपचारिक व्यापार समझौते के अभाव के बावजूद चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है।
चीनी विरोधाभास (The China Paradox)
- चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा, जो पहले ही लगभग 116 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है, लगातार बढ़ रहा है। यह स्थिति तब है जब भारत ने वर्ष 2019 में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) से बाहर रहने का निर्णय विशेष रूप से चीन के आर्थिक प्रभुत्व को सीमित करने के उद्देश्य से लिया था।
- यह विरोधाभास संरचनात्मक है। भारत चीन से उच्च-मूल्य की मशीनरी और औषधि निर्माण हेतु मध्यवर्ती कच्चा माल (Pharmaceutical Intermediates) आयात करता है, जबकि निर्यात मुख्यतः निम्न-मूल्य वाली वस्तुओं का करता है, जबकि भारत में श्रम लागत चीन की तुलना में कहीं कम है।
- इससे स्पष्ट होता है कि केवल सस्ता श्रम वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता सुनिश्चित नहीं कर सकता। चीन की 35 वर्षों की तकनीकी बढ़त, जिसे सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 35-40% से अधिक की निरंतर बचत एवं निवेश दर ने मजबूत किया, उसे केवल लागत-आधारित प्रतिस्पर्धा से चुनौती नहीं दी जा सकती।
अमेरिका की बदलती व्यापारिक कसौटियाँ
- अमेरिका द्वारा बंधुआ श्रम और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता जैसे गैर-शुल्कीय अवरोधों (Non-Tariff Barriers) का उल्लेख सिद्धांत से अधिक व्यापारिक रियायतें (Trade Concessions) प्राप्त करने की रणनीति प्रतीत होता है।
- चूँकि अधिकांश विकासशील देशों का निर्यात अपेक्षाकृत कम सौदेबाजी क्षमता वाले श्रम और उत्पादन अधिशेष पर आधारित है, इसलिए ऐसे तर्क समान मानकों की बजाय चयनात्मक दबाव के साधन बन सकते हैं।
प्रौद्योगिकी आत्मनिर्भरता की अनिवार्यता
- सबसे बड़ा सबक यह है कि विकसित अर्थव्यवस्थाएँ पूँजी (Capital) तो उपलब्ध कराती हैं, किंतु अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी (Advanced Technology) के हस्तांतरण से कतराती हैं।
- भारत के लिए ब्रिटेन, यूरोपीय संघ (EU) और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों के साथ व्यापारिक साझेदारियों का विस्तार अल्पकालिक राहत तो दे सकता है, किंतु जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के अनुभव बताते हैं कि तकनीकी क्षमता के अभाव में व्यापार घाटा बना रह सकता है।
निष्कर्ष
भारत की व्यापारिक चुनौतियों का स्थायी समाधान केवल नए व्यापार समझौतों में नहीं, बल्कि स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास (R&D), प्रौद्योगिकी नवाचार तथा उच्च-मूल्य विनिर्माण क्षमता के निर्माण में निहित है। प्रौद्योगिकी-आधारित वैश्विक व्यवस्था में वास्तविक प्रतिस्पर्धात्मकता का आधार आत्मनिर्भर ज्ञान, नवाचार और तकनीकी क्षमता ही हो सकती है।