भारत का पोषण विरोधाभास: सार्वजनिक स्वास्थ्य के दोहरे बोझ से निपटने की चुनौती
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6, 2023–24) ने भारत की पोषणीय स्थिति का एक ऐसा विरोधाभासी चित्र सामने रखा है, जो गंभीर चिंता का विषय है। एक ओर जहां अनेक बच्चे अब भी अवरुद्ध वृद्धि (Stunting) और कुपोषण से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उसी परिवार या समुदाय में मोटापे और जीवनशैली-जनित स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त वयस्क भी दिखाई देते हैं। यह स्थिति केवल पोषण संक्रमण का संकेत नहीं देती, बल्कि यह दर्शाती है कि आर्थिक प्रगति के बावजूद संतुलित और गुणवत्तापूर्ण पोषण तक समान पहुंच सुनिश्चित नहीं हो सकी है।
गंभीर परिदृश्य
- यद्यपि बाल अवरुद्ध वृद्धि (NFHS-6 में 29.3%), अल्प वजन की व्यापकता (31.8%) तथा गंभीर क्षीणता (Severe Wasting) (5.2%) जैसी समस्याएं मानव पूंजी को कमजोर कर रही हैं, वहीं सामान्य मोटापा तथा अन्य जीवनशैली एवं चयापचय संबंधी विकार एक समानांतर पोषण संक्रमण की ओर संकेत करते हैं।
- अभाव और अतिरेक का यह सह-अस्तित्व दर्शाता है कि मात्र आर्थिक वृद्धि पोषण संबंधी समानता सुनिश्चित करने में सफल नहीं रही है।
नीतियों एवं संस्थागत व्यवस्था का पुनर्संरेखन
- इस चुनौती से निपटने के लिए आवश्यक है कि पोषण 2.0 (POSHAN 2.0) में गैर-संचारी रोगों (NCDs) के प्रति संवेदनशील पोषण लक्ष्यों को शामिल किया जाए।
- इसके साथ ही खाद्य पदार्थों पर फ्रंट‑ऑफ‑पैक लेबलिंग तथा अधिक स्वस्थ खाद्य परिवेश को बढ़ावा देने जैसे उपाय भी अपनाए जाएं।
- संस्थागत स्तर पर आंगनवाड़ी केंद्रों को केवल कैलोरी-आधारित पूरक पोषण तक सीमित न रखकर आहार की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना होगा।
- साथ ही ‘आशा’ कार्यकर्ताओं को दोहरे पोषण बोझ की पहचान और प्रारंभिक हस्तक्षेप के लिए सक्षम बनाया जाना चाहिए।
संरचनात्मक कमियां
- स्वास्थ्य, कृषि तथा महिला एवं बाल विकास जैसे क्षेत्रों के बीच लगातार बनी हुई अंतर-मंत्रालयी विखंडन की स्थिति नीतिगत समन्वय को कमजोर करती है।
- इसके अतिरिक्त, सेवा प्रदायगी में मौजूद कमियां, विशेषकर मातृ पोषण संबंधी महत्वपूर्ण हस्तक्षेपों की कम पहुंच और सीमित उपयोग, वांछित परिणामों में बाधा उत्पन्न करते हैं।
पोषण-संवेदनशील रूपरेखा की ओर
इस विरोधाभास का समाधान जीवन-चक्र आधारित दृष्टिकोण अपनाने में निहित है। इसके लिए स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा और स्वच्छता क्षेत्रों के बीच अधिक प्रभावी अभिसरण सुनिश्चित करना होगा। साथ ही आहार की गुणवत्ता, व्यवहारगत परिवर्तन तथा निवारक स्वास्थ्य सेवाओं पर विशेष बल देना आवश्यक है। डेटा-आधारित लक्षित हस्तक्षेपों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप पोषण समाधानों की भूमिका इस दिशा में निर्णायक सिद्ध होगी।