भारत-ऑस्ट्रेलिया द्विपक्षीय व्यापार: प्रगति और उभरती चुनौतियां

आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौते (ECTA-2022) के चार वर्ष बाद भारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापार संबंध एक ऐसे दौर को प्रतिबिंबित करते हैं, जहां उल्लेखनीय उपलब्धियों के साथ नई चुनौतियां भी समानांतर रूप से उभर रही हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय वस्तुगत व्यापार दोगुना होकर 24.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो इस समझौते की प्रारंभिक सफलता का स्पष्ट संकेत है। किंतु वस्तुगत व्यापार का लगभग दो-तिहाई हिस्सा ऑस्ट्रेलिया के पक्ष में रहने से यह भी स्पष्ट हो गया है कि दोनों देशों के बीच अब अधिक संतुलित, न्यायसंगत एवं पारस्परिक हितों पर आधारित व्यापारिक ढांचे की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

निवेश प्रवाह की भिन्न तस्वीर

  • दिलचस्प रूप से निवेश के क्षेत्र में स्थिति भिन्न दिखाई देती है।
  • ऑस्ट्रेलिया में भारत का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 32 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, जबकि भारत में ऑस्ट्रेलिया का संचयी निवेश लगभग 18 अरब डॉलर है।
  • यह दर्शाता है कि पूंजी प्रवाह, अपेक्षाकृत असंतुलित व्यापारिक समीकरण में, भारत को पारस्परिक संतुलन का एक आधार प्रदान करता है।

कृषि: सबसे जटिल क्षेत्र

  • कृषि अब भी वार्ताओं का सबसे संवेदनशील एवं जटिल क्षेत्र बना हुआ है।
  • भारत में औसत कृषि जोत का आकार मात्र 0.73 हेक्टेयर है, जबकि ऑस्ट्रेलिया में यह 1,400 हेक्टेयर से अधिक है।
  • भारत में कृषि आधी से अधिक आबादी की आजीविका का आधार है।
  • अतः किसी भी व्यापारिक ढांचे को इन संरचनात्मक वास्तविकताओं का सम्मान करना होगा, न कि दोनों कृषि प्रणालियों को समान मानकर चलना होगा।
  • गेहूं, डेयरी एवं चावल जैसे क्षेत्रों की सुरक्षा भारत की वास्तविक घरेलू आवश्यकताओं को प्रतिबिंबित करती है।

व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (CECA) की दिशा

  • प्रस्तावित व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (CECA), जिसमें डिजिटल व्यापार, निवेश संरक्षण और सेवाएँ शामिल होंगी, एक व्यापक और अधिक न्यायसंगत समझौते के लिए उपयुक्त माध्यम सिद्ध हो सकता है।

आगे की राह

भारत को व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (CECA) को केवल बाजार पहुंच से जुड़े रियायत-आधारित समझौते के रूप में नहीं, बल्कि एक रणनीतिक सौदे के रूप में देखना चाहिए, जहां सीमित बाजार खोलने के बदले स्वच्छ ऊर्जा, कौशल गतिशीलता एवं प्रौद्योगिकी सहयोग जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित किए जा सकें। इस प्रक्रिया का उद्देश्य पूर्ण समानता नहीं, बल्कि संतुलन होना चाहिए।