भरण-पोषण का अधिकार और आर्थिक आत्मनिर्भरता: लैंगिक-तटस्थ न्याय का उभरता प्रतिमान

हाल ही में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में स्पष्ट किया कि केवल वैवाहिक संबंध विच्छेद हो जाने के आधार पर पति या पत्नी को भरण-पोषण का स्वतः अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। न्यायालय ने कहा कि यदि पत्नी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है तथा उसकी आय पति से अधिक है, तो सामान्यतः उसे भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता, जब तक कि वह वास्तव में अपना निर्वाह करने में असमर्थ न हो। इस निर्णय ने सामाजिक संरक्षण और संविधान में निहित समानता के सिद्धांत के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर पुनः बहस को जन्म दिया है।

भरण-पोषण के निर्धारण में नए मानदंड क्यों उभर रहे हैं?

  • भरण-पोषण संबंधी कानूनों का मूल उद्देश्य आर्थिक रूप से आश्रित जीवनसाथी को अभावग्रस्त होने से बचाना तथा वैवाहिक संबंध टूटने के बाद सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना था।
  • महिलाओं की बढ़ती कार्यबल भागीदारी और आर्थिक आत्मनिर्भरता ने पारंपरिक पारिवारिक संरचना को बदल दिया है। ऐसे में न्यायालय अब केवल लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक आर्थिक आवश्यकता के आधार पर भरण-पोषण के दावों का आकलन कर रहे हैं।
  • न्यायिक निर्णयों में अब आय अर्जित करने की क्षमता, जीवन स्तर, वित्तीय दायित्वों तथा प्रत्येक मामले की विशिष्ट परिस्थितियों जैसे कारकों को अधिक महत्व दिया जा रहा है।

लैंगिक-तटस्थ न्याय की नई कसौटी

  • आवश्यकता-आधारित दृष्टिकोण वास्तविक समानता को बढ़ावा देता है, क्योंकि इससे भरण-पोषण अपने मूल उद्देश्य अर्थात ‘आर्थिक कठिनाइयों से संरक्षण’ तक सीमित रहता है, न कि स्वतः प्राप्त होने वाले कानूनी अधिकार के रूप में।
  • लैंगिक-तटस्थ न्यायिक दृष्टिकोण यह स्वीकार करता है कि आर्थिक असुरक्षा केवल किसी एक लिंग तक सीमित नहीं है, जिससे न्याय व्यवस्था के प्रति जनविश्वास भी सुदृढ़ होता है।
  • साथ ही, न्यायालयों को अवैतनिक देखभाल कार्य, पारिवारिक दायित्वों के कारण करियर में हुए त्याग तथा अन्य अप्रत्यक्ष योगदानों के प्रति भी संवेदनशील रहना चाहिए, क्योंकि ये किसी जीवनसाथी की दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।

समानता और संरक्षण के बीच संतुलन

भरण-पोषण संबंधी कानूनों की विकसित होती न्यायिक व्याख्या भारतीय समाज में बदलती सामाजिक एवं आर्थिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करती है। ऐसा संतुलित कानूनी ढांचा, जो आर्थिक न्यायसंगतता और सामाजिक संरक्षण दोनों को समान महत्व दे, संविधान में निहित निष्पक्षता, गरिमा और समान न्याय के आदर्शों को अधिक प्रभावी ढंग से साकार कर सकता है।