बाब-अल-मंडेब में भू-राजनीतिक अस्थिरता: भारत की चुनौतियाँ एवं रणनीतिक अनिवार्यताएँ

अमेरिका द्वारा संभावित सैन्य कार्रवाई के जवाब में ईरान द्वारा हूती विद्रोहियों को बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य बंद करने के कथित निर्देश के बाद इस सामरिक समुद्री मार्ग पर संकट एक बार फिर गहरा गया है। यह घटनाक्रम होर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर हाल ही में उत्पन्न तनाव के तुरंत बाद सामने आया है। भारत के लिए, जिसका लगभग एक-तिहाई विदेशी व्यापार यमन और हॉर्न ऑफ अफ्रीका के बीच स्थित इस महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है, यह केवल दूरस्थ भू-राजनीतिक घटनाक्रम नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष आर्थिक एवं सामरिक चुनौती है।

वर्ष 2024 से मिले सबक

  • वर्ष 2023–24 के दौरान हूती विद्रोहियों के हमलों ने लाल सागर (Red Sea) में समुद्री व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित किया। लगभग 2,000 जहाजों को केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) मार्ग से होकर गुजरना पड़ा।
  • भारत आने वाले माल की आपूर्ति में विलंब हुआ, मिस्र की स्वेज नहर से होने वाली आय में भारी गिरावट दर्ज की गई तथा इज़राइल का ईलात (Eilat) बंदरगाह दिवालिया हो गया।
  • उस समय भारत ने ईरान के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों का उपयोग कर हमलों को रुकवाने का प्रयास किया, किंतु यह तात्कालिक समाधान था, दीर्घकालिक रणनीति नहीं।
  • वर्तमान परिस्थितियाँ अधिक जटिल हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) गहरे मतभेदों से विभाजित है, जिससे सामूहिक कार्रवाई की संभावना सीमित हो गई है।
  • दूसरी ओर, चीन हूती विद्रोहियों के साथ अपने एकपक्षीय समझौतों (Quid Pro Quo) को जारी रखे हुए है, जिससे नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था और अधिक कमजोर होती है।

सक्रिय समुद्री सुरक्षा ढाँचे की आवश्यकता

  • भारत को प्रतिक्रियात्मक (Reactive) नीति से आगे बढ़कर पूर्व-निवारक (Pre-emptive) समुद्री प्रतिरोधक रणनीति अपनानी होगी।
  • फ्रांस और जापान के साथ त्रिपक्षीय नौसैनिक कार्यबल (Trilateral Naval Task Force) इस दिशा में एक प्रभावी विकल्प हो सकता है। दोनों देशों के जिबूती (Djibouti) में सैन्य अड्डे हैं तथा वे भारतीय नौसेना के साथ संयुक्त अभ्यास भी कर चुके हैं।
  • यह कार्यबल किसी औपचारिक सामरिक गठबंधन के बजाय क्षेत्र-विशिष्ट (Theatre-specific) सहयोग के रूप में कार्य कर सकता है।
  • इन्फॉर्मेशन फ्यूज़न सेंटर–हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR) समुद्री क्षेत्रीय जागरूकता (Maritime Domain Awareness) का प्रमुख केंद्र बन सकता है, जबकि फ्रांस और जापान आवश्यक लॉजिस्टिक सहयोग प्रदान कर सकते हैं।
  • साथ ही, मिस्र और सऊदी अरब जैसे देशों को भी इस पहल में शामिल करना आवश्यक होगा, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्थाएँ भी इस समुद्री मार्ग की स्थिरता पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं।

निष्कर्ष

‘क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा एवं विकास’ (SAGAR) की परिकल्पना तथा नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था के अनुरूप एक व्यापार सुरक्षा कार्यबल (Trade Protection Task Force) भारत की समुद्री कूटनीति को नई दिशा दे सकता है। इससे भारत अपने व्यापारिक हितों, समुद्री आपूर्ति शृंखलाओं और भारतीय नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षित, मुक्त एवं निर्बाध समुद्री आवागमन का एक प्रमुख संरक्षक बनकर उभर सकता है।