अपशिष्ट जल पुन: उपयोग: भारत की जल सुरक्षा का अप्रयुक्त संसाधन

भारत में प्रतिदिन 72,000 मिलियन लीटर से अधिक घरेलू अपशिष्ट जल उत्पन्न होता है, लेकिन इसका केवल एक छोटा हिस्सा ही उपचारित कर पुन: उपयोग में लाया जाता है। दूसरी ओर, प्रायद्वीपीय भारत से लेकर उत्तरी मैदानों तक जल-संकट लगातार गहराता जा रहा है। सिंचाई, औद्योगिक शीतलन, भूजल पुनर्भरण तथा गैर-पेय शहरी उपयोगों के लिए उपचारित अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग इस संकट का अपेक्षाकृत सरल और प्रभावी समाधान हो सकता है, किंतु संरचनात्मक, संस्थागत और व्यवहारगत बाधाएँ इसकी संभावनाओं को सीमित कर रही हैं।

अवसंरचना एवं उपचार क्षमता की कमी

  • विशेषकर टियर-II और टियर-III शहरों में उत्पन्न सीवेज की तुलना में उपचार क्षमता अत्यंत अपर्याप्त है, जहाँ विकेंद्रीकृत उपचार प्रणालियों का भी अभाव है।
  • जहाँ सीवेज उपचार संयंत्र (STPs) मौजूद हैं, वहाँ भी अनेक संयंत्र अपनी निर्धारित क्षमता से कम पर चलते हैं या उत्सर्जन मानकों को पूरा नहीं कर पाते, जिससे प्राप्त जल सुरक्षित पुन: उपयोग के योग्य नहीं रह जाता।

संस्थागत विखंडन

  • जल राज्य सूची का विषय होने के कारण अपशिष्ट जल पुन: उपयोग से जुड़ी नीतियाँ शहरी स्थानीय निकायों, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (SPCBs) और सिंचाई विभागों के बीच बंटी हुई हैं तथा पुनर्चक्रण को अनिवार्य बनाने वाला कोई एकीकृत नियामकीय ढाँचा नहीं है।
  • इज़राइल अथवा सिंगापुर के एनईवॉटर (NEWater) मॉडल की तरह बाध्यकारी पुन: उपयोग लक्ष्यों का अभाव इसे स्वैच्छिक और असंगत बनाए रखता है।

आर्थिक एवं सामाजिक बाधाएँ

  • उपचारित अपशिष्ट जल, विशेषकर कृषि या पेयजल से जुड़े उपयोगों के संदर्भ में, सामाजिक स्वीकार्यता की कमी का सामना करता है, जिसका कारण स्वास्थ्य संबंधी आशंकाएँ और शुद्धता से जुड़ी सांस्कृतिक धारणाएँ हैं।
  • साथ ही, दोहरे पाइपलाइन नेटवर्क तथा तृतीयक उपचार (Tertiary Treatment) की लागत इतनी अधिक होती है कि सब्सिडी अथवा मिश्रित शुल्क मॉडल के अभाव में नगर निकाय और किसान इसे अपनाने से हिचकते हैं।

नीतिगत एवं निगरानी संबंधी कमियाँ

  • उपचारित अपशिष्ट जल के सुरक्षित पुन: उपयोग हेतु राष्ट्रीय ढाँचा तथा AMRUT जैसी योजनाएँ दिशा तो प्रदान करती हैं, किंतु क्रियान्वयन की निगरानी अभी भी कमजोर है।
  • उपचारित जल की गुणवत्ता तथा उसके अंतिम उपयोग से संबंधित रियल-टाइम डेटा भी सीमित है।

भावी कार्यनीति क्या होनी चाहिए?

भारत की जल सुरक्षा के लिए अपशिष्ट जल को बोझ नहीं, बल्कि एक संसाधन के रूप में देखना आवश्यक है। इसके लिए शहरी नियोजन स्वीकृतियों से जुड़े अनिवार्य पुन: उपयोग लक्ष्य, स्रोत के निकट विकेंद्रीकृत उपचार, पुनर्चक्रित जल अवसंरचना हेतु वायबिलिटी गैप फंडिंग, तथा जनविश्वास बढ़ाने के लिए निरंतर जागरूकता अभियान आवश्यक हैं।