AI के पर्यावरणीय प्रभाव: भारत के लिए आगे की राह क्या हो?
जैसे-जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति को नई दिशा दे रही है, वैसे-वैसे इसके ऊर्जा, जल और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभाव भी एक गंभीर चिंता के रूप में सामने आए हैं। भारत के लिए एक उभरती हुई AI महाशक्ति बनने के साथ-साथ अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करना तभी संभव होगा, जब तकनीकी प्रगति और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।
AI का पर्यावरणीय प्रभाव
- लार्ज AI मॉडल्स के प्रशिक्षण और संचालन के लिए अत्यधिक संगणन (Computing) क्षमता की आवश्यकता होती है, जिससे बिजली की खपत बढ़ती है। भारत में ऊर्जा उत्पादन का बड़ा हिस्सा अभी भी कोयले पर आधारित होने के कारण इससे कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि होती है।
- डेटा सेंटरों को शीतलन (Cooling) के लिए भारी मात्रा में मीठे जल की आवश्यकता होती है, जो जल-संकट से जूझ रहे भारत के लिए एक गंभीर चुनौती है।
- इसके अतिरिक्त, हार्डवेयर के लगातार उन्नयन (Upgradation) से ई-अपशिष्ट की मात्रा बढ़ रही है, जबकि भारत की पुनर्चक्रण (Recycling) क्षमता अभी सीमित है।
भारत के लिए नीतिगत उपाय
भारत निम्नलिखित उपायों के माध्यम से इस चुनौती का प्रभावी समाधान कर सकता है:
- डेटा सेंटरों के लिए ऊर्जा-दक्षता मानकों को अनिवार्य बनाया जाए तथा उन्हें नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के निकट स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
- संसाधनों की कम खपत करने वाले, भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप क्षेत्र-विशिष्ट (Domain-specific) AI मॉडल विकसित किए जाएँ, जिससे संसाधन-गहन विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता कम हो।
- विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के माध्यम से ई-अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था को और सुदृढ़ बनाया जाए।
- इंडियाएआई मिशन (IndiaAI Mission) के अंतर्गत धारणीयता (Sustainability) ऑडिट को शामिल किया जाए, ताकि AI का विस्तार पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के अनुरूप हो।
वैश्विक एवं संस्थागत समन्वय
- भारत को उत्तरदायी AI से जुड़े बहुपक्षीय विमर्शों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए देश में कार्यरत वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए पर्यावरणीय प्रकटीकरण के समान मानक विकसित करने की वकालत करनी चाहिए।
- साथ ही, G20 और जलवायु नेतृत्व के माध्यम से न्यायसंगत वैश्विक मानकों के निर्माण में योगदान देना चाहिए।
निष्कर्ष
AI के पर्यावरणीय प्रभावों के प्रति भारत की नीति यह तय करेगी कि वह
सतत नवाचार (Sustainable Innovation) का वैश्विक उदाहरण बनेगा या पारंपरिक विकास मॉडल की पर्यावरणीय चुनौतियों को ही दोहराएगा। इसलिए
“ग्रीन-बाय-डिज़ाइन” (Green-by-Design) दृष्टिकोण अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है।